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June 16, 2019
July 29, 2016
तुम्हारी नज़्म
गुलज़ार
साब को जितना पढ़ते हैं
उनकी
नज्में हमें अंदर से थोड़ा और खाली कर जाती है
खालीपन
जिसमें कुछ नही बचता सिर्फ गुलज़ार के
गुलज़ार
जो अब एक एहसास हो चुके हैं
उम्र, लफ्ज़, जिस्म
से परे..
![]() |
| Dedicated to Gulzar Saab |
तुम्हारी
नज्म पढ़ी
आधी से कुछ ज्यादा
पूरी से कुछ कम
आधी से कुछ ज्यादा
पूरी से कुछ कम
मेरी
आँखों के काले मोती उलझ गए
डायरी में बिखरे तुम्हारे लफ़्ज़ों से
डायरी में बिखरे तुम्हारे लफ़्ज़ों से
पलट
कर वो लम्हा मैंने
मूँद लिया पलकों को
किताब को सीने से लगाया
तो जाकर अटक गया वो
साँसों के बीच कहीं
मूँद लिया पलकों को
किताब को सीने से लगाया
तो जाकर अटक गया वो
साँसों के बीच कहीं
वो
लम्हा जिसे
आजाद होना है
या फिर कैद हो जाना है तुझमें
वो नज़्म जिसे
पूरा होना है..
आजाद होना है
या फिर कैद हो जाना है तुझमें
वो नज़्म जिसे
पूरा होना है..
या
फिर छूट जाना है मुझमें
सुनो
ना
सुनो तो
तुम्हे किसी मोड़ पर
नज़्म का वो कतरा मिले
तो छोड़ आना उसे वहीँ
मेरे लिए तुम
तुम्हारा
कुछ वक्त ले आना
सुनो तो
तुम्हे किसी मोड़ पर
नज़्म का वो कतरा मिले
तो छोड़ आना उसे वहीँ
मेरे लिए तुम
तुम्हारा
कुछ वक्त ले आना
ना
जाने कब से
अपने वजूद का दूसरा सिरा तलाशती
तुम्हारी नज्म अधूरी है..
अपने वजूद का दूसरा सिरा तलाशती
तुम्हारी नज्म अधूरी है..
- अंकिता
चौहान
यह मैं भी एक नज्म होत्ती(2014) का शायद जुड़्वा हिस्सा होगा.. जो अगस्त गुलज़ार है(2015) से होता हुआ 2016 तक मेरे साथ चला आया..18 अगस्त जन्मदिन विशेष!
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कविता-संग्रह
July 04, 2016
बात समझ में देर से आई - एक कविता
बात
समझ में देर से आई
रात अंधेरे तारे तकना
गिन-गिन
तेरी
उंगली
पे रखना
क्यूँ
बेकस
मन को भाता है
बहते
बादल, आधा चाँद
मुझे
तुम तक क्यूँ ले जाता है
बात
समझ में देर से आई।
शाम ढले वो उजला पंछी
मन की धनक मुंडेरों पर
किस
उम्मीद
को चुगने आता है
ढाई
लफ्ज़ औ’ दो मिसरे
मेरे होंठो पर
क्यूँ रख जाता है
बात
समझ में देर से आई।
सबके
मुंह की समझाईश
क्यूँ
बेमानी हो जाती है
तेरी
हथेली कांधे पर
बेबोल ही सब कह जाती है
बेबोल ही सब कह जाती है
बात
समझ में देर से आई।
मेरे मन की गीली मिट्टी
तेरी
यादों की टप-टप सुनती है
सौंधी
बारिश, तेरी खूश्बू
इतरों
में कहाँ सम्भलती है
बात
समझ में देर से आई।
तेरे होने में अक्सर
मैं क्यूँ खुद को पा जाती हूँ
मैं क्यूँ खुद को पा जाती हूँ
दूर
पास के फेर में घुलकर
मैं
कैसे
तुम
हो जाती हूँ
बात
समझ में देर से आई
यही..बात
समझ में देर से आई।
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कविता-संग्रह
May 08, 2016
गुलजार साब की एक नज़्म - मां
तुझे
पहचानूंगा कैसे?
तुझे
देखा ही नहीं
ढूंढ़ा
करता हूं तुम्हें
अपने
चेहरे में कहीं
लोग
कहते हैं
मेरी
आँखे मेरी माँ सी है
यूं
तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर
प्यासी हैं
कान
में छेद है
पैदायशी
आया होगा
तूने
मन्नत के लिए
कान
छिदाया होगा
सामने
दांंतोंं का वक़्फ़ा है
तेरे
भी होगा
एक
चक्कर
तेरे
पांव के तले भी होगा
जाने
किस जल्दी में थी
जन्म
दिया, दौड़ गई
क्या
ख़ुदा देख लिया था
कि
मुझे छोड़ गई
मेल
के देखता हूँ
मिल
ही जाएं तुझ-सी कहीं
तेरे
बिन ओपरी लगती है
मुझे
सारी जमीं
तूझे
पहचानूंगा कैसे?
तूझे
देखा ही नहीं।
-
- गुलजार
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कविता-संग्रह
March 05, 2016
वक्त के साथ-साथ..
रोज़
सुनता हूँ
राह
चलते मुसाफिरों से
वक़्त
बदल गया है..
लोग
बदल गए है
कभी
कभी उनपर यकीन हो आता है
कहीं
मैं भी तो नहीं बदल गया...
लेकिन
कुछ लम्हें, बार-बार मन की मुंडेर पर दस्तक देते हैं
लम्हें
जिनमें कुछ यारियाँ बसी हैं
कुछ
बचपन बसा है
कहीं
हंसी खनकती है
तो
कहीं यारों की बातें..
एक
अरसे बाद उनका मिलना
यकीन दिला देता है,
कि
इस ‘बदले हुए कुछ’ को भी
बेहद खूबसूरती से जी लेगें,
अगर
यारियाँ साथ हो..
February 29, 2016
तुम चले जाओगे - कवि अशोक वाजपेयी
![]() |
| Photo Credit |
पर थोड़ा सा यहाँ भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सौंधी सी गंध
भोर के उज़ास में
थोड़ा सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार
तुम चले जाओगे
पर थोड़ी सी हँसी
आँखों की थोड़ी सी चमक
हाथ की बनी थोड़ी सी कॉफी
यहीं रह जाएँगे
प्रेम के इस सुनसान में
तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूँजता
तुम्हारे पास होने का अहसास
तुम चले जाओगे
और थोड़ा सा यहीं रह जाओगे।
- कवि अशोक वाजपेयी
December 22, 2015
कविता - ख्वाहिशें
वह सपने देखती है,
जागती आँखों से ज़िंदगी
के और आँख मूँद कर किताबो के।
वह बेसुध थिरकती है,
कभी बाबा की डाँट पर तो कभी माँ
के दुलार पर।
हर इंकार पर थोड़ा सहम जाती है,
अपनी ख्वाहिशों के पंख समेट इंतज़ार
करती है...
मजबूत करती है
हर वो पक्ष
जो उसे अपने सपने के शायद और करीब ले जाए।
कहने को बच्ची है..
लेकिन अपना बचपन, काफी पहले पीछे छोड़ आती है।
लादी हुई समझदारी से..
जब खुद को परेशान पाती है तो
नादानियों की झील में
एक डुबकी लगा,
बस एक कहानी गड़
लाती है...।
October 19, 2015
हमेशा देर कर देता हूँ मैं - मुनीर नियाज़ी
हमेशा देर कर देता हूँ मैं..
जरूरी बात कहनी हो
कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो
उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..
मदद करनी हो उसकी
यार की ढ़ारस बंधाना हो
बहुत देरीना रस्तों पर
किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं..
बदलते मौसमों की सैर में
दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो
किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..
क़िसी को मौत से पहले
किसी ग़म से बचाना हो
हकीकत और थी कुछ
उसको जाके ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..
- मुनीर नियाज़ी
(Voiced by Me)
जरूरी बात कहनी हो
कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो
उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..
मदद करनी हो उसकी
यार की ढ़ारस बंधाना हो
बहुत देरीना रस्तों पर
किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं..
बदलते मौसमों की सैर में
दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो
किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..
क़िसी को मौत से पहले
किसी ग़म से बचाना हो
हकीकत और थी कुछ
उसको जाके ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..
- मुनीर नियाज़ी
(Voiced by Me)
September 12, 2015
ग़ुलज़ार साब की एक नज़्म
काले घर में सूरज रख के,
तुमने शायद सोचा था, मेरे सब
मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़ जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया.
तुमने शायद सोचा था, मेरे सब
मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़ जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया.
तुमने एक समन्दर हाथ
में ले कर,
मुझ
पर ठेल दिया।
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख
दी,
काल चला तुमने और मेरी जानिब
पर ठेल दिया।
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख
दी,
काल चला तुमने और मेरी जानिब
देखा,
मैंने काल को तोड़ क़े
लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया.
मैंने काल को तोड़ क़े
लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया.
मेरी ख़ुदी को तुमने
चन्द
चमत्कारों से मारना चाहा,
मेरे इक प्यादे ने तेरे चाँद का
मोहरा मार लिया
चमत्कारों से मारना चाहा,
मेरे इक प्यादे ने तेरे चाँद का
मोहरा मार लिया
मौत की शह दे कर
तुमने समझा
अब तो मात हुई,
मैंने जिस्म का ख़ोल उतार क़े
सौंप दिया,
और रूह बचा ली,
अब तो मात हुई,
मैंने जिस्म का ख़ोल उतार क़े
सौंप दिया,
और रूह बचा ली,
पूरे-का-पूरा आकाश
घुमा कर अब
तुम देखो बाजी,
पूरे-का-पूरा आकाश घुमा कर अब
तुम देखो बाजी..
तुम देखो बाजी..
- गुलज़ार साब
P.s - Tried to recite his Nazm. Found it Inspirational and heartwarming.(ग़ुस्ताखी माफ)
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कविता-संग्रह
September 05, 2015
शिक्षक : एक कविता
शिक्षक
वह पुल है जो आपकी उंगली थामकर
आपको
अज्ञानता के अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाता है।
शिक्षक
वह आयाम है जो आप पर अपनी राय थोपे बिना
आप
जिदंगी में क्या करना चाहते हैं, उसको निखारने में मदद करे।
शिक्षक
वह दिशा है जब सभी रास्ते बंद नज़र आये तो
अर्जित
किया ज्ञान पुंज, आप के अंदर प्रज्वलित कर सके।
शिक्षक
वह मुस्कान है जो आपकी हर सफलता को सराहे
साथ
ही असफलता के दौर से जूझने का साहस दे।
शिक्षक
वह शख्स है जो आपको अंकगणित सीखाते हुए
आपके
जीवन की अभिन्न कविता बन जाए!
- Ankita Chauhan
July 06, 2015
Waqt Mila To Sochenge - Poetry
क्यूँ
तू अच्छा लगता है वक़्त मिला तो सोचेंगे
तुझ
में क्या क्या देखा है, वक़्त मिला तो सोचेंगे
सारा
शहर शानासाई का दावेदार तो है लेकिन
कौन
हमारा अपना है, वक़्त मिला तो सोचेंगे
हमने
उसको लिखा था कुछ मिलने की तदबीर करो
उसने
लिखकर भेजा है, वक़्त मिला तो सोचेंगे
मौसम, खुशबू, बादे-सबा, चाँद, शफक
और तारों में
कौन
तुम्हारे जैसा है, वक़्त मिला तो सोचेंगे
या
तो अपने दिल की मानो या फिर दुनिया वालों की
मशविरा
उसका अच्छा है, वक़्त मिला तो सोचेंगे
क्यूँ
तू अच्छा लगता है वक़्त मिला तो सोचेंगे ।
Attaullah
Khan recited it at coke studio (Pakistan)
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कविता-संग्रह
May 27, 2015
लौट कर आना तेरा
लौट कर आना तेरा
मुमकिन नहीं अगर
इन वादों की रसीदें
तू साथ लेता जा..
ये निगाह-ए-तन्हाई औ’
खामोशियों के सुर
रूठा हुआ दिल-ए-साज़ भी
तू साथ लेता जा..
आँखों में ठहरी नमी
हथेली पर आ ज़मी
लकीरों में उगते उफ़ूक भी
तू साथ लेता जा..
माना के तेरे चर्चे
तेरी शोहरत सर-ए-जहां
गुजरी तेरे बगैर
ये मेरी ज़िदगी निहां..
सांसों में आ उलझा है
इक आखिरी अरमां
बेमाने इस वज़ूद से
निज़ात देता जा..
लौट कर आना तेरा
मुमकिन नहीं अगर
इन वादों की रसीदें
तू साथ लेता जा..
तू साथ लेता जा..
- Ankita Chauhan
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कविता-संग्रह
April 08, 2015
February 15, 2015
गुलजार साब की नज़्म - सब कुछ वैसे ही चलता है
“जो गुजर जाती है बस उसपे गुज़र करते हैं" ज़िंदगी की दास्तां बयाँ करते गुलजार साब के लफ्ज़ हमारे एहसासों को आवाज़ दे जाते हैं। अक्सर उनकी नज़्मों और गीतों में उलझ कर मायने मिल जाते हैं सांसों को, अर्थ मिल जाता है जीवन का..
कैसे कोई इतने आसान लफ्ज़ों में अनकही
यादें पिरो देता है, क्यूँ हम अपनी ज़िदंंगी में घटा हुआ, उनके गीतों में ढ्ंढू लेते हैं, शायद यही गुलजार हैं..
गुलजार साब की नज़्म "सब कुछ वैसे ही
चलता है" धीमे से कामों में एक कड़वा सच गुनगुना जाती है कि ज़िंदगी एक रवायत
है, जिसे निभाना पड़ता है, उनके बिना भी जो कभी आपकी ज़िंदगी थे।
सब कुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था जब तुम थी
रात भी वैसे ही
सर मूंदे आती है
दिन भी वैसे ही
आँखें मलता जागता है
तारे सारी रात जम्हाईयाँ लेते हैं
सब कुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था
जब तुम थी
काश तुम्हारे जाने पर
कुछ फर्क तो पड़ता जीने में
प्यास ना लगती पानी की
या नाखून बढना बंद हो जाते
बाल हवा में ना उड़ते
या धुंआ निकलता सांसों से
सब कुछ वैसे ही चलता है
बस इतना फर्क पड़ा है मेरी रातों में
नींद नहीं आती तो
अब सोने के लिए
एक नींद की गोली
रोज़ निगलनी पड़ती है
- गुलजार साब
Post dedicated to Maa
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कविता-संग्रह
January 26, 2015
Alvida 2014
![]() |
| Photo Credit : Arushi Calender |
Although It could have written at the end of the year. But how could you write something without missing
someone, so yes I am missing you Dear 2014, you have added some beautiful,
sweet-and-salty moments to my life.
Guzar chala ye saal bhi,
yun laga mano
hawa ke jhonke mein lipta ek lamha
aahista se,
mujhe chookar nikla ho abhi abhi..
Kuch khatte meethe shikwe,
Kahin Sukoo’n bhari yaadein,
Kuch ek jhoote vaado’n
mein simta vo ek lamha..
anubhav ki gathri
(sack) bhari kar gaya ho..
umra mein kuch jod, Kuch ghata kar
zindagi ke ankganit uljha kar
ek masoom si rivayat nibha
Guzar chala ye saal bhi..
- Ankita Chauhan
December 26, 2014
Kuch Ishq
आहिस्ता-आहिस्ता,
अब-जब वक़्त बिछड़ने लगा है हथेली से
कुछ आहट महसूस होती है इर्द-गिर्द
डबडबाती पलकें उठाकर देखती हूँ तो
खुद की सांसे ही तैरती मिलती हैं
कुछ बदहवास तो कुछ लावारिस
अनजाने में खामोशी के कुछ
बीज बो दिए थे हमनें,
दिल तक पहुँचती हर राह पर
ना जाने कब,
शिकवों की बर्फ-सी जम गई
इक युग बीत चला,
दो रूहें अर्ज़ी लगाए हुए हैं बरसों से
मानों आखें भी आज़ाद होना चाहती हों
उक्ता गई हों एक बेहिस नज़रिये से
आज सामने पाकर तुम्हें
झिझक की कैद से
चुरा लिया मैंने
एक लम्हा
अधरों पर बिखर गया
गीली हंसी में डूबा इक सवाल,
“इतने अरसे बाद मिले हैं हम
कुछ इश्क़ तो जी रहा होगा तुझमें भी,
कुछ मुहब्बत तो तुझमें अब भी धड़कती होगी..!”
- अंकिता चौहान
September 19, 2014
नया अहसास
![]() |
| Photo courtesy : Vivek Arya |
सच !
कितना मुश्किल है
अधूरे किस्से को
पूरा करना
किस्सा, जिसके फूल
जैसे किरदार
एक साथ बैठकर गढ़े थे,
कभी हमनें
समय की धूप में
आँचल रहता तुम्हारा,
मेरे अस्तित्व पर
बारिशों में
मैं अपना रैन-कोट
तो कभी अपनी मोहब्बत,
ओढ़ा दिया करता
तुम्हें...
अपने कांपते हाथों
में
उस नन्ही सी
मुस्कान को लिए
जब तुम पहली बार घर आई
तुम्हारी आँखों से
बरसती खुशी
एक अरसे तक
भिगोती रही मेरा
कॉलर
खमोश पल, फिर भी कितना
सुखद !
कॉलर तो आज भी
भीग जाया करता है, तुम्हारी
यादों में
लेकिन मुझे दिया हुआ
तुम्हारा मासूम
तोहफा
वही नन्ही सी
ज़िन्दगी, हथेली रख देती है
मेरे गालों पर,
निर्जीव क्षणों में
उत्सव भर
हमारी नन्ही परी
जीवित रखे हुए है
मुझे...
उसके साथ..
एक नए अहसास,
एक नए पात्र को जी
रहा हूँ
सुनो ! खुश खबरी है,
धीरे-धीरे
मैं एक माँ हो रहा
हूँ !
- अंकिता चौहान
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