Showing posts with label A Journey with Mumma. Show all posts
Showing posts with label A Journey with Mumma. Show all posts
June 16, 2019
October 14, 2015
The Place I Often Missed Is Your Lap
October is the month, I had lost you. And when I saw this
“MakeYourMotherSmile” campaign running on the occasion of Kalam Sir’s Birthday,
I was wondering how could I do this when you’re not even around me anymore? I
can sense your touch though, but scent of your presence, warmth of your breath,
reminiscence of your lap… How could I bring back all those memories, just in
few words?
I was not an easy child. I literally
don’t know how did you manage all chores especially my tantrums? And then I learnt
no one can understand your silence except your mother, genuinely you were
silence-reader, were? You still are…whenever I get upset, the moments I spent
with you, make me smile and I forget for a while, that you are not with me anymore. You are the one who made me believe that we
make mistakes, we try, we can’t be perfect, and that’s how we live.
When I was in hospital, that while
liquid continuously flowing in my left arm—drop by drop. Doctor advised you to caress
my arm, the six nights you didn’t even care to blink. How could you love me so selflessly? You
taught me how to feel pain of someone else, when your 6-years-old student broke her
hand— I caught an intense pain in your eyes as well. That’s the definition of Mother.
Although I have been trying to survive without
you, but my fingers still yearn for your palm, memorizing your words
‘Simplicity what makes us unique!’
I owe you my life…Maa!
June 27, 2015
पापा
6 मई को मधुरिमा(दैनिक भास्कर) के मातृत्व
विशेषांक में एक छोटी सी कहानी या कहिए संस्मरण प्रकाशित हुआ। बेहद खुशी हुई, जिसकी अपेक्षा ना की हो, उसका मिल जाना जादू सा लगता है ना।
दो दिन पहले दैनिक भास्कर की तरफ से एक लिफाफा आया, एक cheque था। हैरान थी मैं और थोड़ा-सा खुश भी, लिखने के पैसे मिलते हैं?
मधुरिमा ने अपने अमूल्य पृष्ठों के बीच
मेरे शब्दों को स्थान दिया,
ये अपने आप मे किसी
उपहार से कम नहीं था मेरे लिए। पापा खुश थे मुझसे कई ज्यादा खुश। ‘शाबाश’ कहा
उन्होंने, ज्यादा बोलते नहीं हैं वो, मेरे नॉव्लस पढ़ने को या कुछ लिखने को वो
सिर्फ शौक की तरह ही देखते हैं, लाइक
अ टाइमपास।
“ऐसे ही खूब लिखा करो, और इस cheque एक शॉट (Photo) ले लो”
“रहने दो पापा, छोटू सा amount है, कभी
कुछ बड़ा मिला तो पक्का लूंगी” और
टाल दिया मैंने पापा की बात को।
पापा फिर उस लिफाफे को देखने लगे, मुझे नहीं पता क्या ढ़ूंढ रहे थे वो उस
कागज़ के टुकड़े में। दैनिक भास्कर लिखा था और घर क पता, Ankita Chauhan, D/O ******* *****
Chauhan
शाम को घर आये तो वही लिफ़ाफा थमाते हुए
बोले-
“वो cheque तो मैंने जमा करवा दिया, लिफाफे में उसकी एक फॉटोकॉपी है, इसको संभाल के रखना, पहला है”
Link of That Story
Labels:
A Journey with Mumma,
Articles,
NoteBook
May 24, 2015
प्रयास : मातृत्व विशेष
मेरे इस छोटे से ‘प्रयास’ को मधुरिमा (मातृत्व
विशेषांक 6 मई 2015) में जगह देने के लिए दैनिक भास्कर और रचना संमदर जी (संपादक)
को ढेर सारा शुक्रिया।
![]() |
| Madhurima : Dainik Bhaskar |
प्रयास
अतीत की स्मृतियों में खो जाना और धीमे-धीमे मुस्कुराना,
अक्सर माँ को ऐसे ही देखा था मैंने। आज अपने पुराने बक्सों में समायी यादों को
टटोलते देखा तो उनके पास जा बैठी मैं। माँ अक्सर कहा करती थी ये कपड़े नही तुम्हारा
बचपन है मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत यादें। एक दिन जब तुम इस घर से विदा हो जाओगी
तब भी ये यादें मेरे पास रहेंगी।
आज माँ उन्ही कपड़ों को तत्परता से एक बैग में डाल
रही थी। पूछा मैंने “ क्या इस खजाने को बैंक लॉकर में रखवाने का इरादा है?”
- अंकिता चौहान
Labels:
A Journey with Mumma,
Articles,
NoteBook,
Published,
Short Stories
February 15, 2015
गुलजार साब की नज़्म - सब कुछ वैसे ही चलता है
“जो गुजर जाती है बस उसपे गुज़र करते हैं" ज़िंदगी की दास्तां बयाँ करते गुलजार साब के लफ्ज़ हमारे एहसासों को आवाज़ दे जाते हैं। अक्सर उनकी नज़्मों और गीतों में उलझ कर मायने मिल जाते हैं सांसों को, अर्थ मिल जाता है जीवन का..
कैसे कोई इतने आसान लफ्ज़ों में अनकही
यादें पिरो देता है, क्यूँ हम अपनी ज़िदंंगी में घटा हुआ, उनके गीतों में ढ्ंढू लेते हैं, शायद यही गुलजार हैं..
गुलजार साब की नज़्म "सब कुछ वैसे ही
चलता है" धीमे से कामों में एक कड़वा सच गुनगुना जाती है कि ज़िंदगी एक रवायत
है, जिसे निभाना पड़ता है, उनके बिना भी जो कभी आपकी ज़िंदगी थे।
सब कुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था जब तुम थी
रात भी वैसे ही
सर मूंदे आती है
दिन भी वैसे ही
आँखें मलता जागता है
तारे सारी रात जम्हाईयाँ लेते हैं
सब कुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था
जब तुम थी
काश तुम्हारे जाने पर
कुछ फर्क तो पड़ता जीने में
प्यास ना लगती पानी की
या नाखून बढना बंद हो जाते
बाल हवा में ना उड़ते
या धुंआ निकलता सांसों से
सब कुछ वैसे ही चलता है
बस इतना फर्क पड़ा है मेरी रातों में
नींद नहीं आती तो
अब सोने के लिए
एक नींद की गोली
रोज़ निगलनी पड़ती है
- गुलजार साब
Post dedicated to Maa
Labels:
A Journey with Mumma,
Articles,
Gulzar Saab,
NoteBook,
कविता-संग्रह
April 10, 2014
March 20, 2014
तब याद करोगे
![]() |
| photo courtesy - Google |
दिन किसी अनचाहे
मेहमान की तरह
जाने का नाम ही नहीं
ले रहा,
टिक कर बैठ गया...
रात भी ना जाने किस
ट्राफिक जाम में फस
गयी,
या इसने भी
ना आने के कई बहाने
तलाश लिये...
और मध्यकड़ी बनी ये साँझ
स्मृतियों के आगे
प्रश्नचिन्ह सा लगा रही हैं...
जैसे रेत पर उंगली
से लिखा
इक खूबसूरत नाम मिट
रहा हो
धीरे-धीरे...
जैसे समंदर की बेफिक्र
लहरें
मेरी सांसों में
उलझे इक शख्स को
बहा ले जा रही हों,
अपने साथ
ऐसी ही एक बुझती शाम,
अदा से कहा था तुमने-
“ नही रहूगीं ना, तब
याद करोगे “
तुम्हे गया अरसा हुआ,
नामालुम क्यूँ !
उन लफ्ज़ों के दंश
आज भी आँखें सुर्ख
कर जाते हैं...
हर रिश्ता दिल से
निभाना आदत थी ना तुम्हारी,
बादस्तूर, अपना हर शब्द
निभा जाना
. . . क्या इतना जरूरी था
!!
- अंकिता चौहान
March 10, 2014
अक्सर !
![]() |
| Photo Courtesy - Google |
तितली से परों-सी
नज़ाकत लिये
तुम्हारे अल्फाज़ जब
भी
मेरे ख्वाबों की
मुंडेरों पर
दस्तक देते हैं,
समेट लेती हूं
कुछ आधे अधूरे संवाद,
कुछ वक़्त की धुंध
में
बिसरी झलकियाँ,
कुछ तुम्हारी आवाज़
में
गूंजते नगमें,
कभी एक आलिंगन ...
फिर सुबह-सुबह स्याह
पलकों पर
जब बिछने लगती है,
धूप की इक सुनहरी
चादर
. . .मेरी मुठ्ठी बंद
मिलती है अक्सर !!
- अंकिता चौहान
July 08, 2013
स्पर्श
![]() |
| Photo Courtesy - Goolgle |
जान नहीं पाई मैं,
कैसे अनकहे ही
सब जान जाती थी तुम..
मेरी एक आह सुनते ही
गहरी नींद से जाग जाती थी तुम..
मेरी एक मुस्कुराहट पर
अपने सारे दर्द भुला देती थी तुम..
मेरे निराश होने पर
आशा के अखण्ड दीप जला देती थी
तुम..
मेरी अनसुलझी धड़कनों की
मध्यकड़ी थी तुम..
कभी-कभी मेरे लिए
अपने ईश्वर से भी लड़ी थी तुम..
अंतिम विदाई पर हल्की मुस्कान लिए
जब तुम जड़ सी पड़ी थी,
सहमी हुई सी मैं
निशब्द खड़ी थी..
इस आस में कि,
तुम आओगी एक दिन
वक़्त के पहियों को निरंतर तकती हूँ..
पास नहीं हो तुम मेरे
फिर भी तुम्हरा स्पर्श महसूस करती हूँ..!!
- अंकिता चौहान
Labels:
A Journey with Mumma,
NoteBook,
कविता-संग्रह
Subscribe to:
Posts (Atom)









