January 03, 2014

शायद !!

उसके चेहरे पर महकती है जब मुस्कान की इक सुबह,
उसको सवाँरते ग़ुज़र जाती हैं ना जाने मेरी कितनी शामें...

3 Sep 2013
आज अपनी ज़िन्दगी के एक नये अध्याय को, 
दुनिया की इक नयी भाषा को
पढ़ने की जद्दोज़हद में लगा हुआ है वह
कॉलेज का पहला दिन है ॥

12 Oct 2013
सुबह से उसके मोबाइल में
तैर रहा है पहला नशा
और भी कई प्यार भरे लम्हातों की
संज़ीदगी ओढ़े कुछ सुरीली धुनें...
आज खुश है वो,
एक चहकते पंछी की तरह
आस्मां के क्षितिज से परे,समय से परे
उड़ जाना चाहता हो जैसे
उसकी खुशी मेरे होठों पर छलक रही है
मैं भी आज खुश हूँ ॥

2 Nov 2013
आज सुबह से दिख नहीं रहा
बिनकहे ना जाने कहाँ निकल गया !
हमेशा बता के जाये,
इतना छोटा भी तो नहीं रहा,
शायद बड़ा हो गया वो आज
और मैं नाहक ही परेशान ॥

18 Dec 2013
सुबह के चार बजे हैं
और अभी तक साहबज़ादे के कमरे की
लाईट-ऑन है, य़े बच्चा भी ना..!!

कितना इररेस्पोनसिबल हो गया है,
कहता है “ माँ असाईनमेंटस “।
नज़दीक पहुँचने पर पता लगा
वो कुछ गुनगुना रहा है,
विडियो कॉलिंग पर है “ग़ुड मॉर्निग बेबी”
जैसे कई राग अलाप रहा है...

मुस्कुराते हुए किचन तक
और किचन से डॉइनिंग टेबल तक पहुँची
तब तक साढ़े आठ बज चुके थे,

नया हेयर्-कट लिए अपने कॉलेज-बैग के साथ
भागता हुआ आया,सैंड्विच उठाया,मोबिइल पर नज़रें गढ़ाए
किसी अज़नबी झोंके की तरह निकल गया वह...
नियमितता की पटरी से उतर गयीं मेरी कुछ धड़कनें
कुछ ठहर गई मैं !
आँखों में आई नमी को
एक हल्की मुस्कान की तरफ ढकेला,
शायद जल्दी में होगा वरना
”अच्छा ! माँ मिलते हैं शाम में” कह
अपनी भोली सी मुस्कान बिखेर
मिटा दिया करता था मेरी सारी थकान,
मैं फिर देने लगी खुद को
“शायद” लफ्ज़ के साथ गढ़ी कुछ तस्सलियाँ ॥

23 Jan 2014
शाम को क़ॉलेज़ से कंधे पर लदे बैग के साथ
उदासी भी टांग लाया चहरे पर,
”खाना खा के आया हूँ” कहकर
विडियो-गेम्स में उलझ गया, कुछ पलों में लाइट-ऑफ
दस ही तो बजे थे अभी !
इतनी तेज़ ठंड और “शायद” एक्स्ट्रा-क़्लासेज़ !!

24 Jan 2014
अधखुली आँखों से देखा,
घड़ी पाँच की ओर इशारा करने लगी,
उसके रूम की लाइट जल चुकी थी..

बालों को समेटते हुए अनचाहे ही लबों पर मुस्कान तैर गई
और धीमा सा स्वर “नौटंकी”
कमरे में झांका तो
वो मासुमियत का कम्बल ओढ़
करवट दर करवट कुछ यादों की स्लाइड्स बदल रहा था
कभी खुद से लड़ रहा था,
कभी तकिया गीला कर रहा था...

मेरे होंठों की मुस्कान को कर रफा दफा,
वह स्थान कुछ प्रश्नों ने लिया..

मुझे देखते ही वह लिपट गया मुझसे
उसकी आँखें बोल रही थी जैसे
आज ज़िन्दगी जीने का एक और सबक सीख गया हो...

गोद में लेटे लेटे ही सीलिंग को निहारते हुए
भारी पलकों के साथ वह सो गया
शायद सारी रात रोया होगा,
चेहरे पर एक अमिट खामोशी बिखरी थी
शायद कोई कीमती रिशता खोया होगा...

9 का अलार्म भी आज उसकी नींद में
खलबली मचाने में असमर्थ रहा,
हल्की नर्म धूप निकल रही थी कोहरा छँट सा गया,
वह मेरी गोद में कुछ और सिमट सा गया,
मानो सदियों बाद बेटा घर लौटा हो !

मुझे तो खुश होना था, ना जाने क्यूँ  आज मैं भी उदास हूँ,
शायद इसलिये कि “ मैं एक माँ हूँ ..!! ”
    
- अंकिता चौहान

PS - Dedicated to all lovely Mothers & their Selfless love.