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September 11, 2023

मानव कौल - रूह । कश्मीर यात्रा पर आधारित

 



किताब: रूह 
लेखक: मानव कौल
प्रकाशक: हिंदी युग्म
विधा: यात्रा-संस्मरण 
पेपरबैक: 175 पृष्ठ

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मानव कौल की यह किताब 'रूह', कश्मीर पर लिखा गया यात्रा-संस्मरण है। यात्रा बाहरी से कहीं अधिक भीतरी। मन में चलती उठा-पठक और नॉस्टालजिया। समकालीन विषयों से इतर, यहाँ मानव की नज़र से कश्मीर दिखता है। कश्मीर जो उनका घर था, वह जिस मनोभाव से घर की दीवारों-दरवाज़ों को अपने लिखे में जीवित करते हैं, सराहनीय है।

दृश्य, जब वह बचपन में मौजूद लोगों को अपने सामने पाते हैं, सुंदर है। मानव खुद कहते हैं कि ये कश्मीर के ज़्वलंतशील मुद्दों को केंद्र में रखकर लिखी गई किताब नहीं है। यह डॉक्यूमेंटेशन है, एक ऐसे बच्चे का जिसका जीवन उस एक क्रूर हादसे ने बदल कर रख दिया।

किताब में एक अन्य पात्र, रूहानी जो पूरी यात्रा में उनके साथ है, ‘बहुत दूर कितनी दूर होता है’ में भी आप इसी तरह के पात्र से रू-ब-रू हुए होंगे। क्या ये पात्र काल्पनिक हैं? नाम भले अलग हों, लेकिन वे प्रतिरूप होने का आभास देते हैं, यह दोहराव पाठक को ज़रा विलगाता है।

अगर आप मानव कौल को पहली दफ़ा पढ़ रहे हैं तो यह किताब जादू-सी लगेगी।

ईमानदार राय रखूँ तो मानव ने जितना खुद को ‘बहुत दूर कितना दूर होता है’ में रचा है, ‘रूह’ उस उँचाई को छूने से ज़रा चूक गई। सनद रहे, इनकी किताबों के ज़रिए अनगिन हिंदी पाठक तैयार हो रहे हैं। और यह एक उपलब्धि है। किताब का एक अंश साझा कर रही हूँ -

सन् 1988 के बाद से जो भी घटा था इस वादी में, और वादी से निकल गए सारे परिवारों ने जो सहा था, उन सब लोगों की कहानियों को अगर हम सुनना शुरू करेंगे तो हमें अपनी इंसानियत पर शर्म आने लगेगी। जिस तरह बाहर रह रहे कश्मीरी पंडितों को छूते ही वे फूट पड़ते हैं, ठीक वैसे ही यहाँ रह रहे कश्मीरी मुस्लिम भी पुरानी घटनाओं पर फट पड़ते हैं। लेकिन इन सबमें पंडितों का कश्मीरी मुस्लिम और कश्मीरी मुस्लिम का पंडितों के प्रति स्नेह भाव ख़त्म नहीं हुआ है। यहाँ घूमते हुए जब भी किसी को पता चलता है कि मैं पंडित हूँ, ठीक उसी वक़्त से हमारी बातचीत में एक अपनापन आ चुका होता है। 'इसे सब पता है' वाला एक भाव दोनों के संवादों में रहता है। अब जो पंडितों की नई पीढ़ी है, उसे घटनाओं की सुनी हुई जानकारी है, जिन्होंने उन घटनाओं को जिया था वे या तो बहुत बूढ़े हो चुके हैं या वे अब नहीं रहे। कश्मीरी मुस्लिम बच्चे जो उस वक़्त बड़े हो रहे थे, या जो पंडितों के बच्चे यहाँ से नहीं गए थे, उनके बचपन के जिए हुए की छाप उनके चेहरे... पर साफ़ दिखती है। 'तुम लोग तो चले गए थे, मैं इस वाक्य के पीछे का मर्म समझ सकता हूँ।

October 02, 2016

किताब समीक्षा: ठीक तुम्हारे पीछे – मानव कौल



शीर्षक: ठीक तुम्हारे पीछे

लेखक: मानव कौल

पब्लिशर: हिन्दी युग्म

विधा: कहानी संग्रह 

"इन तीन सालो में मैंने तुम्हें जितना जिया है और जितना तुमने मुझे याद किया है हम वो सब एक दूसरे को वापस दे देंगे और फिर हमारे सबंध में 'है' के सारे निशान मिट जाएँगे”

मैंने अभिनेताओं गायकों, गीतकारों पर लिखी हुई कई किताबें पढ़ी हैं। जिनमें उनके निज़ी जीवन से लेकर बॉलीवुड जगत में उनके संघर्ष और उपलब्धियों का जिक्र होता है। लेकिन किसी अभिनेता का खुद कहानी लिखना, ना केवल शौक की तरह बल्कि उन कहानियों को पूर्ण किताब की शक्ल देकर पाठकों के हाथों में सौंप देना, इतना आसान कहाँ होता है? अंग्रेज़ी भाषा में नसरुद्दीन साहब ने यह ईमानदार कोशिश की है उनकी आत्मकथा “एण्ड दैन वन डे” 2015 में सुर्खियों में थी। लेकिन हिन्दी की जेब अधिकतर खाली ही रही।

हिन्दी फिल्म जगत के जाने माने अभिनेता मानव कौल ने अपनी पहली किताब “ठीक तुम्हारे पीछे” के जरिये वही खाली जगह भरने का प्रंशनीय प्रयास किया है। बॉलीवुड में अपने सुगढ़ अभिनय के लिए चर्चित मानव कौल को आप शायद काई पो छेके बिट्टू मामा या वजीरके मंत्री जी के नाम से पहचान लें, हिन्दी फिल्म जगत में आप रुचि रखते हैं तो शायद आपने भारत पाक सैनिकों पर बनी 1971 भी देखी हो। अगर आप थियेटर जगत में रूचि रखते हैं तो मुम्किन है आपने इनके कई बहुचर्चित नाटकों से परिचित हों। 

हाल ही में हिन्दी युग्म द्वारा प्रकाशित इनकी किताब ठीक तुम्हारे पीछे कुल बारह कहानियों का संग्रह है। कहानी में पिरोया हुआ हर पात्र अलहदा, एक उम्मीद की डोर थामे अपने अंतर्मन ने जूझता हुआ मिलता है।  

मानव कहते हैं  “मुझे कोरे पन्ने बहुत आकर्षित करते हैं। मैं कुछ देर कोरे पन्नों के सामने बैठता हूँ तो एक तरह का संवाद शूरू हो जाता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे देर रात चाय बनाने की आदत में मैं हमेशा दो कप चाय बनाता हूँ एक प्याली चाय जो अकेलापन देती है वह मैं पंसद नहीं करता। दो प्याली चाय का अकेलापन असल में अकेलेपन के महोत्सव मनाने जैसा है”  बात बहुत सादे शब्दों में कही गयी है लेकिन यकीन हो जाता हैं कि मानव कौल का लेखन परिपक्व है। लिखना कभी भी कठिन शब्दों का चुनाव भर करना नहीं होता उसके लिए तो शब्दकोश मौजूद है। लेखन खुद से चलकर कहानी के किरदार की आत्मा तक पहुँचना है। उस किरदार से एक अंदरूनी रिश्ता कायम करने जैसा हैजो इस किताब में बखूबी दिखता है। मानव कौल की कहानियाँ हमें उसी रूहानी सफर पर ले जाती हैं। उनका लिखा हुआ हम क़रीब से महसूस करते हैं। उनके पात्रों की उलझनों और उनकी खुशियों के बीच सफ़र करते हैं। कहानियाँ कई उम्र का सफर तय करती हैं। ये चुनाव करना मेरे लिए बहुत ही कठिन है की किस कहानी का कौन सा पात्र श्रेष्ठ है। “अभी-अभी से कभी-का तक” कहानी में मानव कौल कहते हैं “दर्शक बने रहना आसान नही है खासकर जब आपके पास खुद करने के लिए कुछ भी ना हो और आपके अगल बगल इतने बेहतरीन अभिनय कर रहे हो” एक ऐसा व्यक्ति जो हॉस्पिटल-बैड पर रात दिन अपने आने वाले कल को संशय से देखता है। उसे यकीन है कि वो उस किनारे नहीं लगेगा जहाँ ज़िंदगी सांसे छोड़ देती हैउबर जाएगा वो इस बीमारी से फिर भी रोज़ खुद को उसी ओर सरकता पाता है जो उसे बस एक याद बना देगा। “गुणा भाग” कहानी में लेखक कितना सधा हुआ लिखते हैं कि “इन तीन सालो में मैंने तुम्हें जितना जिया है और जितना तुमने मुझे याद किया है हम वो सब एक दूसरे को वापस दे देंगे और फिर हमारे सबंध में है के सारे निशान मिट जाएँगे” एक रिश्ते में होकर भी ना होनावजह पता होते हुए भी ढूंढते रहना कि क्या पता कोई ऐसा सिरा मिल जाए जो रिश्ते को “है” से “था” ना होने दे

 इनके अलावा “मुमताज़ भाई पंतग वाले” और “माँ” इन दो कहानियों को पढ़ना किसी अलसायी सी दोपहर में नीम की ठंडी छाँव में सुस्ताने जैसा है या ट्रेन के किसी स्टेशन पर रुकने पर बेचैन आँखो से कुल्हड़ वाली चाय का इंतजार करने जैसा। तपते रेगिस्तान में दो घूँट जिंदगी की तरह मिलने जैसा भाव लिए मानव कौल का यह कहानी-संग्रह हिन्दी साहित्य जगत के पाठकों के लिए सोच के नए द्वार खोलता हैपढ़ने के बाद भी देर तक हमारे अंदर इन कहानियों की गूँज रह जाती है। अपनी बुकशेल्फ में इसे ज़रूर जगह दीजिएगा।

नोट: यह समीक्षा मूलत: गाँव कनेक्शन के लिए लिखी गयी है। आर्टीकल गाँव कनेक्शन की वेबसाइट पर पढ़ा जा सकता है।