December 09, 2013

ऐसे जियो ..!!

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रात की सुराही ने कल
फिर कई ख्वाब बिखेरे थे
कुछ मुकम्मल हो धड़क उठे
कुछ जन्मे ही अधूरे थे...

एक ख्वाब, ठिठके बगैर
बेसबब लिपट गया तकिये से मेरे
कई हर्फ लबों पर लिए
नज़रों से ताकीदें गढ़ता वो ख्वाब

कुछ खामोशी,
कुछ मदहोशी में करवटें लेता वो ख्वाब...
मैनें गिरा दिया परदा जब दो दियों का
तो, निगाहों में समेट मेरी झलक
उड़ चला
जीवन की रंज़िशों से दूर, बहुत दूर...

नगमें बह रहे थे
उस मुहब्बत से लबरेज़ अब्र पर
किताबों को हम नहीं, किताबें हमें
लफ्ज़ दर लफ्ज़ पढ़ने के लिए बेकरार थीं...

कहीं, बेझिझक सांस लेते
अल्हड़ चंचल रिश्ते  खिल रहे थे
कहीं हिज़्र और विसाल आँख-मिचौली खेल
स्नेह शब्द का स्वाद चख रहे थे...

कुछ लम्हें हाथ थामे बिना मंज़िल
तय किए. . .बस चले जा रहे थे

वहाँ ज़िन्दगी की पगडंडी पर
गुनगुना रहा था साज़-ए-अहसास...
सांसों की बाँसुरियों में बह रहे थे
ना जाने कितनी ही गज़लों के मिसरे
और उन सुरमयी सरगमों पर
थिरक रही थीं, छोटी छोटी खुशियाँ...

एक सिलसिला चाहती थी मैं
उस ख्वाब और मेरे दिल की सर्द फिज़ा के मध्य
तभी किरणों की गुनगुनी आहट ने
मुंदी अँखियों पर दस्तक दी

फिर खामोशी में खो गया वो ख्वाब
वास्तविकता की धूप में सिफर हो गया मेरा ख्वाब

उस सुबह मेरे कमरे की खिड़की से झाँकते
जड़वत दरख्तों के असीमित इंतज़ार को महसूस किया
मैंने पहली दफा. . .
जो कि कानों में अनवरत एक ही जीवनराग घोल रहे थे


ऐसे जियो कि खुद से पार चले जाओ ....!!

- अंकिता चौहान