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April 08, 2020

Translated Literature: Book Recommendations

Painting of Willard Leroy Metcalf : The Convalescent, 1904


“Once you overcome the one-inch tall barrier of subtitles, you will be introduced to so many more amazing films,” said Bong Joon-ho, Director of Parasite. Same goes with Translated Literature. I love them, and they're always on my radar. Although, I am not a well-read person, still made a list of my favourite ones. Hope it may help you to decide your next pick. Happy Reading! 


1. Ghachar Ghochar by Vivek Shanbhag (Tr. Srinath Perur)
2. Affections by Rodrigo Hasbun (Tr. Sophie Hughes)
3. Mother of 1084 by Mahasweta Devi (Tr. Samik Bandyopadhyay)
4. The Notebook by Agota Kristof (Tr. Alan Sheridan)
5. The Shadow of the Wind by Carlos Ruiz Zafón (Tr. by Lucia Graves)
6. Convenience Store Woman by Sayaka Murata (Tr. Ginny Takemori)
7. The Vegetarian by Han Kang (Tr. Deborah Smith)
8. Cobalt Blue by Sachin Kundalkar (Tr by Jerry Pinto)
9. In a Time of Burning by Cheran (Tr. Lakshmi Holmström)
10. The Unbearable Lightness of Being by Milan Kundera (Tr. Michael Henry Heim)
11. Abandon by Sangeeta Bandyopadhyay (Tr. arunava sinha)
12. Other Colors: Essays and A Story by Orhan Pamuk (Tr. Maureen Freely)
13. A River Dies of Thirst: journals by Mahmoud Darwish, (Tr. Catherine Cobham)
14. Pedro Páramo by Juan Rulfo (Tr. Margaret Sayers Peden)
15. Lifting The Veil by Ismat Chughtai (Tr. M. Asaduddin)
16. Bonsai by Alejandro Zambra (Tr. Carolina De Robertis)
17. Here by Wis
ława Szymborska, (Tr. Stanisław Barańczak & Clare Cavanagh)
18. Marrow by Yan Lianke, (Tr. Carlos Rojas)
19. 33 Revolutions by Canek Sánchez (Tr. Guevara, Howard Curtis)
20. The Beach at Night by Elena Ferrante (Tr. Ann Goldstein)
21. Letters to a Young Poet by Rilke (Tr. Reginald Snell)
22. The House in Smyrna by Tatiana Salem Levy (Tr. Alison Entrekin)
23. The Stranger by Albert Camus (Tr. Matthew Ward)
24. Sputnik Sweetheart by Haruki Murakami (Tr. Philip Gabriel) 



March 14, 2019

Notes : So Much Noise



कल ‘मैन बुकर प्राइज़’ की लॉगलिस्ट अनाउंस हुई, 13 किताबें। इस बार लिस्ट में काफी सारी लेखिकाओं के काम को जगह दी गयी, यह देखकर खुशी हुई, साथ ही छोटी इंडीपेडेंट प्रेसेज़ से प्रकाशित काम को भी शामिल किया गया।

मैंने, अब तक लिस्ट में से एक भी किताब नहीं पढ़ी, अजीब लगा। थोड़ा बहुत पाते हैं, कितना कुछ छूट जाता है। सारी तो नहीं लेकिन इन चार किताबों को अपनी टू-बी-रीड पाईल में शामिल किया है, इस साल इन्हें जरूर पढ़ना है।

Jokha Alharthi - Celestial Bodies (Sandstone Press Ltd)
Annie Ernaux - The Years (Fitzcarraldo Editions)
Hwang Sok-yong - At Dusk (Scribe, UK)
Samanta Schweblin - Mouthful Of Birds (Oneworld)

जब हिन्दी की किताबें नहीं पढ़ती तो हिन्दी के शब्द भूल जाती हूँ, वहाँ भी करीब बीस किताबें अनटच्ड रखी हैं, टेड़ी लकीर, हर बारिश 
में, लखनऊ की पाँच रातें...।

इस साल ट्रांसलेशंस पढ़ने का ज्यादा मन है, नहीं पता ये किसी और के साथ होता है या नहीं, लेकिन जब काम करती हूँ, तो सोचती हूँ ऐसा क्या लिख दूँगी जो पहले नहीं लिखा गया, इससे अच्छा पढ़ लेती हूँ, कितना कुछ सीखना है, कुछ भी तो नहीं आता।

जब किताब खोलती हूँ तो रिग्रेट होता है, कितना सारा काम बचा है, जरूरी है, इस उलझन में मन गिल्ट से भर जाता है, मूवी देखते वक्त भी सेम फीलिंग, स्क्रीन टाईम महज़ 15 मिनट।

कितने सारे डायरेक्टर्स हैं, जिनका पूरा काम देखने का मन है, Satyajit Ray, Maniratnam, Vittorio-de-sica, Jean-luc-godard, Andrei-tarkovsky, Louis-malle, Krzysztof-kieslowski, सत्यजीत रे का काम तो पढ़ना भी है, आधा-पौना पढ़ के किताब दूसरे किनारे रख दी।

फिर लगता है, क्या करना है इतना सब ज्ञान लेकर, सब फालतू है, म्यूजिक सुन लूँ काफी है, अबिदा परवीन, बेखम अख्तर, इक्बाल बानो को सुनते हुए पूरी उम्र बिताई जा सकती है, “राम करे कहीं नैना ना उलझे”


फिर आता है... प्लूटो, जब पास होता है, तो सारी दुनिया बेमतलब लगती है, जिद करके ऐसे गले से चिपक जाता है, स्टैच्यू बन जाती हूँ... क्या मैं बहुत ज्यादा पागल हूँ?  

   

December 10, 2018

नोट्स: पागलपन है जिए जाना


एक दिन पहले तक जिनकी हंसने की आवाज सुनी, एक दिन बाद सब कुछ खत्म। कितना अजीब है ये सब, चन्द मिनटों का खेल जैसे, एक महीन सांस का धागा, बनने की प्रकिया में ही टूट गया, या बाती की वो मद्धम लौ जिसका बुझना अचानक होता है, पलक झपकता जीवन, होने और न होने के बीच डोलता हुआ, पेंडुलम। हजारों जिम्मेदारियों का बोझ लादे कंधे अब दूसरे के कांधे की सैर पर हैं, मुस्कुराते ठंडे होंठ सारी चिंताओं से मुक्त, कितना बड़ा पागलपन है जिए जाना, सिर्फ जीते चले जाना। थोड़ा ठहरना है, देखना है पीछे, कितना अनजिया छूट गया, दर्द है टीस भी, गहरी नींद सब मिटा देगी, चंद मिनटो का खेल बस।

-- अंकिता चौहान

December 09, 2018

Notes : Lost in a Bookshelf

बचपन में अपनी स्कूल की किताबों से अलग एक लाइब्रेरी बनाई थी, करीब सौ किताबें कहानियों की, कॉमिक्स से लेकर भारतीय सुपरहीयोज यानी कृष्ण हनुमान महाभारत बाल रामायण हातिम ताई अकबर बीरबल, प्रेमचंद के गोदान गबन तक। जब पढ़ने बाहर गई तो वो लाइब्रेरी गायब हो गई शायद वो बचपन की किताबें उन बच्चों के हिस्से आयीं जिन्हें उनकी ज्यादा जरूरत थी, गोदान के अलावा मम्मी ने सब किताबें बांट दी। इतना गुस्सा आया था मुझे उस वक्त। इतने सारे दिन चुप रही थी। नाइंथ में मैथ्स को अपना दोस्त बना लिया था। उसमे सर खपाना वक्त को खत्म करने का सबसे आसान जरिया लगा। लेह्निजर और जोऑलजी को अलविदा कहकर कुछ साल पहले किताबों की अपनी उसी दुनिया में लौटना एक मजबूरी थी, धीरे धीरे फिर से पढ़ रही हूँ, छोटू सी लाइब्रेरी बनाने की कोशिश कर रही हूँ। ज्यादातर किताबें किंडल में ही हैं। लगता है अपने पीछे जितनी कम फिजिकल प्रेजेंस छोड़कर जाओ उतना अच्छा रहेगा। खुश हूँ, आउटफिट्स को उँगलियों पर काउंट कर सकती हूँ, जरा से हैं। एक्सेसरीज के बारे में सोचने पर भी कुछ ध्यान नहीं आता, किताबें हैं जिन्हें लंबा खाली वक्त मिलते ही डिजिटल शीट में डालना है, कैटलॉग टाईप कुछ। 


June 22, 2018

Storywallah: Short Stories (Neelesh Misra's Mandali)



नीलेश मिसरा सर की आवाज में आपने रेडियो पर, सावन एप पर, यू-ट्यूब पर कई कहानियाँ सुनी होंगी। एक दशक होने को है। कहानियों में रिश्तों की गर्माहट होती है, नॉस्टेलिया होता है, साधारण लोंगो की असाधारण कहानियाँ हैं ये। एहसासों की ये भीतरी यात्रा अब एक किताब की शक्ल में आ रही हैं, नाम है स्टोरीवाला, पेंगुईन इंडिया प्रकाशक हैं। किताब 21 जून से अमेजन पर उबलब्ध है। क़िताब का हिस्सा हूँ खुश हूँ, हैरान हूँ, सपने साँस ले रहे हैं।


Photo Source: Ajendra Singh Bhadoria
Buy Link: STORYWALLAH (Penguin Books) 

July 28, 2017

वो लोग जो आपके कुछ नहीं लगते

वो लोग जो आपके कुछ नहीं लगते। ना कोई रिश्ता ना कोई जानकारी। सोशल मीडिया की इस दुनिया में बहुत से ऐसे लोग मिलते है जिनसे कोई बातचीत नहीं होती फिर भी वो आपकी दिनचर्या का हिस्सा होते है। आपकी टाईमलाईन पर उनके पोस्ट आते है। हम उसके जरिए ही धीरे धीरे उन्हें जानने लगते हैं। उनके पंसदीदा गीत, नज्में, शायर, और फिर एक दिन वो चले जाते हैं। हमेशा के लिए। आपकी पलकें नम हो जाती है। दिल कुछ एक पल के लिए पत्थर-सा हो जाता। आप यकीन नहीं कर पाते कि कल से वो आपकी वर्चुअल ही सही लेकिन इस छोटी सी दुनिया का हिस्सा नहीं होगें। गर्म पानी आँखों से गालों तक आ जाता है। आप रोना नहीं चाहते, उनके लिए जो आपके कुछ नही लगते।

25 जुलाई को ट्वीटर टाईमलाइन पर पढा इंदीवर जी (@frozenmusik) नहीं रहे। उनसे मेरी कभी कोई बातचीत नहीं हुई थी। मैं नीलेश मिसरा सर के लिए थोडा-बहुत लिखती हूँ ये उन्हें मेरी टाईमलाईन देखकर पता चला होगा। अभी जनवरी में जब जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल में नीलेश सर भी पहुँचे। तो उन्होंने सर के सेशन की टाईम-स्क्रीन टैग की। उन्हें लगा होगा शायद मुझे पता नहीं है। मैंने उन्हें प्राईवेट मैसेज करके इतनी सी रिक्वेस्ट की “Sir, I won’t able to attend Neelesh Sir’s session, will you record some clips, just thodi bahut please please

उन्होंने कहा उनके बेटे को फीवर है, फिर भी वो कोशिश करेंगे। मैंने उनसे मना भी किया “ रहने दीजिएगा सर, इट्स नॉट देट इम्पोरटेंट” मैं भूल भी गयी थी अगले दिन उन्होंने वो वीडियोज यू-ट्यूब पर अपलोड कर दिए। ही इज़/वाज़ काईंड सोल, मैन ऑफ हिज़ वर्डस। अभी तीन दिन पहले जब टाईमलाईन पर पढा वो नहीं रहे तो सच में अजीब लगा, लगा जैसे इट इज़ सम काईंड ऑफ प्रेंक। लेकिन ये न्यूज़ पवन झा जी की टाईमलाईन से थी। कार्डियल अरेस्ट। आज 28 जुलाई 2017 को जयपुर में ही उनकी मैमोरियल बैठक है।

नौ साल पहले मम्मा को भी ऐसे अचानक एक एक्सीडेंट में खो दिया था। आज भी सुबह उठती हूँ तो लगता है वही घी के दीपक की गर्माहट लिए मम्मा की हथेली मेरे सर पर ठहर जाएगी। आँखे खोलकर वो सबसे मीठा ख्वाब खो देना बहुत तकलीफ देता है। मम्मा के समय रोना नहीं आया था। शायद उधारी है। जब भी कोई जाता है तो किश्तों में निकलती है।  

No
Time doesn’t heal anything
People leave, void remains.

Indivar Sir, You will be missed. ALWAYS!



           
Clicked By Indivar Sir

May 19, 2016

Note : Ray Bradbury on Writing


If you want to write, if you want to create, you must be the most sublime fool that God ever turned out and sent rambling. You must write every single day of your life. You must read dreadful dumb books and glorious books, and let them wrestle in beautiful fights inside your head, vulgar one moment, brilliant the next. 

You must lurk in libraries and climb the stacks like ladders to sniff books like perfumes and wear books like hats upon your crazy heads. I wish you a wrestling match with your Creative Muse that will last a lifetime. I wish craziness and foolishness and madness upon you. May you live with hysteria, and out of it make fine stories — science fiction or otherwise. Which finally means, may you be in love every day for the next 20,000 days. And out of that love, remake a world.


April 17, 2016

Weakness that I loved the most..

It was a puzzle for me when I used to meet those people, who didn’t take any interest in music. Still I wonder about the rare kind of species. 

Music is not some side part of our days, I think a song has its own life, they breathe, they smile, they weep, and they are kind enough to take us along with them. Music love us back, no matter what, like a mother. right? I literally don’t know where I would be if there was no music in my world.

No, I am not exaggerating things, I simply want to show some gratitude towards a single song which eventually became the part of my routine, and it is “Song of The Caged Bird by Lindsey Stirling (2012)”  Although It is an instrumental but full of emotions, liveliness and heartbeats maybe more than that.  

I am saying this proudly that I can’t create a single piece of writing without it.  And if it seems my weakness then I loved it the most and would like  to carry on with it only till the last.   

- Ankita Chauhan 


December 31, 2015

य़े शाम और ये दूरी - आज सिरहाने

Aaj Sirhaane

इतना नाराज़ हो...?क्रुति ने मासुमियत से पलकें झपकाते हुए पूछा।

तुम्हें फर्क पड़ता है..?अक्षर ने भौंहे चढ़ाते हुए सवाल पर सवाल रख लिया।

पड़ता है ना... देखो इतना पड़ता है ...उम्म नहीं इससे थोड़ा ज्यादा क्रुति ने अपने टैडी बियर को संभालते हुए अपनी बाहें फैला दी

रहने दो तुम...कितना मुश्किल से सब कुछ प्लान किया था...तुम कभी कोशिश ही नहीं करती हो...मुझे समझने कीअक्षर नाराज़ था...बेहद नाराज़। तीन दिन बाद वो अपना घर अपना शहर छोड़ कर जा रहा था...नाराज़ था, क्रुति से नहीं इस रवायत से..कॉलेज़ से निकलते ही प्लेसमेंट ठीक है पर ये इतनी जल्दी जॉइन क्यूँ करना पड़ता है...।

अक्षर ये तीन दिन बस क्रुति के साथ बिताना चाहता था.. दोस्तों तक से झूठ बोल दिया था कि काफी डॉक्यूमेंट्स इकठ्ठे करने हैं...लेकिन क्रुति ने दो दिन पता नहीं कौन सी बुआ की बेटी की शादी में निकाल दिए थे...और आज जब मैडम पधारी तो इतनी बेफिक्र जैसे कुछ हुआ ही नही...!

क्रुति ने महसूस किया था जो अक्षर बोल नहीं पा रहा था...वो थोड़ा रुककर बोली —“मुझसे दोस्ती करोगे...तुम ऑक्सीजन मैं हाईड्रोजन, हमारी कैमिस्ट्री एकदम पानी की तरह है

अक्षर अपनी मुस्कान छुपाते हुए बोला — “सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है आज मेरे पास बाईसेप्स हैं, चार्मिग लुक्स हैं, ये टैडी बियर इधर दो तुम मुझे...हाँ अब टैडी भी है...तुम्हारे पास क्या है?

मेरे पास...मेरे पास प्रेम है...माई लार्ड, भरपूर प्रेम क्रुति ने होंठों को थोड़ा दबाते हुए कहा।

तुम्हारी जैसी लड़की फ्लर्टिंग के लिए नहीं इश्क के लिए बनी है...और इस्स्स्स्क करने की इज़ाज़त मुझे वक़्त दे नहीं रहा..इतनी जल्दी जॉइनिंग मिल गयी, यार ..

क्रुति ने अपनी उदासी को अपनी हंसी में छुपा लिया...अक्षर के हाँथों से टैडी बियर छीनते हुए बोली जॉब ना हुई...सात साल की कैद हो गई...इतना रोते हो...एडजस्ट कर लेंगे यार ..दोस्ती की है निभानी तो पड़ेगी

पुष्पा! आई हैट दिस वर्ड...दोस्ती...दोस्ती नही है मैडम....खालिश इश्क है तुमसे...अंगूठी या माँ के कड़े नहीं नहीं है मेरे पास...लेकिन मेरे पीछे से...ये अपना दिल-विल मत बाँट देना किसी को...समझी?

क्रुति ने शरारती निगाहों से अक्षर को देखते हुए बोली उम्म! कोशिश करूग़ी...बाकी तुम्हारी परफार्मेंस पर डिपेंड करता है...कॉल्स-वॉल्स टाइम पर नहीं आए तो...!
तो क्या..ओएएएए... खामोश..! 

P.s- I Wrote a short comedy cum romantic scene with Shikha Shrivastava for Aaj sirhaane Under "Ulfat-O-Comedy" Section.


October 19, 2015

हमेशा देर कर देता हूँ मैं - मुनीर नियाज़ी

हमेशा देर कर देता हूँ मैं..

जरूरी बात कहनी हो
कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो
उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..

मदद करनी हो उसकी
यार की ढ़ारस बंधाना हो
बहुत देरीना रस्तों पर
किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं..

बदलते मौसमों की सैर में
दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो
किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..

क़िसी को मौत से पहले
किसी ग़म से बचाना हो
हकीकत और थी कुछ
उसको जाके ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ..

- मुनीर नियाज़ी

(Voiced by Me)

October 14, 2015

The Place I Often Missed Is Your Lap

October is the month, I had lost you. And when I saw this “MakeYourMotherSmile” campaign running on the occasion of Kalam Sir’s Birthday, I was wondering how could I do this when you’re not even around me anymore? I can sense your touch though, but scent of your presence, warmth of your breath, reminiscence of your lap… How could I bring back all those memories, just in few words?

I was not an easy child. I literally don’t know how did you manage all chores especially my tantrums? And then I learnt no one can understand your silence except your mother, genuinely you were silence-reader, were? You still are…whenever I get upset, the moments I spent with you, make me smile and I forget for a while, that you are not with me anymore.  You are the one who made me believe that we make mistakes, we try, we can’t be perfect, and that’s how we live.

When I was in hospital, that while liquid continuously flowing in my left arm—drop by drop. Doctor advised you to caress my arm, the six nights you didn’t even care to blink.  How could you love me so selflessly? You taught me how to feel pain of someone else, when your 6-years-old student broke her hand— I caught an intense pain in your eyes as well. That’s the definition of Mother.

Although I have been trying to survive without you, but my fingers still yearn for your palm, memorizing your words ‘Simplicity what makes us unique!’
I owe you my life…Maa!


September 28, 2015

Hindi Saahitya : Bimal Mitra


बिमल मित्र... शायद ही कोई हिन्दी साहित्य प्रेमी इस नाम से अनभिज्ञ होगा। बंगाली और हिन्दी भाषा में लेखन कला के लिए प्रसिद्ध बिमल मित्र जी के उपन्यास और कहानियाँ आज भी उसी चाव से पढ़ी जाती हैं। कहते हैं ना लेखक कभी मरते नहीं...वह अपने शब्दों में अपने पात्रों में जीवित रहते हैं। 



बिमल मित्र जी का जन्म 10 मार्च 1921 में हुआ। रेलवे विभाग में कार्यरत होने के कारण इन्हें भारत में कई जगहों को देखने का मौका मिला। उसी दौरान जन्य जीवन का निकट से अध्ययन किया। 1956 में नौकरी को अलविदा कह साहित्य लेखन से जुड़े। उपन्यास साहब बीबी और गुलाम इनकी मुख्य कृति है। जिस पर बनी फिल्म आज भी क्लासिक्स में रखी जाती है। 



इसके अलावा भी कई उपन्यास हैं जिन्हें किसी कालखंड में नहीं बाँधा जा सकता। बिमल मित्र जी की कहानियाँ हर वर्ग पढ़ता है। सब आसानी से बिमल मित्र जी द्वारा गढ़े पात्रों संग जुड़ाव महसूस करते हैं। कोई कृति सूकून देती है कोई उठल पुथल मचा देती है। हांलाकि ज्यादा नही पढ़ सकी बिमल जी को फिर भी...

ये नरदेह – मेरा परिचय बिमल मित्र जी के लेखन से इसी उपन्यास से हुआ। एक ऐसे रिश्ते की कहानी है जिसे किसी नाम में बांधना शायद मुमकिन ना हो, प्यार.. इश्क़.. बहुत ही छोटे शब्द है। संदीप लाहिरी और विशाखा मुख्य पात्र है जो कि आपको शायद प्यार की एक नयी परिभाषा सिखला दे। मुख्य पात्र प्यार में होकर भी कोई अधिकार नहीं मांगता और अपना सारा जीवन अपने प्यार के लिए खुशियाँ समेटने में बिता देता है। स्वार्थहीन प्रेम को बिमल मित्र जी ने अपने इस उपन्यास मे बखूबी दिखाया है! अगर आप को याद हो तो फिल्म अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने इस उपन्यास पर बने टी.वी सीरीयल में अभिनय भी किया था। जिसका प्रसारण दूर दर्शन पर इंतजार और सही के नाम से हुआ था। 


नायिका – बिमल मित्र जी की नायिका में मुख्य पात्र एक ऐसी महिला है जो कि समाज की नजरों में सम्पूर्ण होते हुए भी अधूरी है। अगर आपने हिन्दी सिनेमा जगत की तीसरी कसम देखी हो तो शायद को-रीलेट कर पाऎंगे। बिमल मित्र जी का लेखन संवेदनशील है.. जो कि आपको कहानी के अंत तक इंसानी वजूद के कई आयामों से रूबरू करवाता है। यह भी खूबी है बिमल जी की उनके पात्र यथार्थता के करीब रहकर ही कहानी को आगे बढ़ाते है। 



सचमुच, मैडम को सम्भालना बड़ा ही टेढ़ा काम था। मैडम का किस वक्त कैसा मूड रहता है, यह शायद मैडम के सृष्टिकर्ता को भी नहीं मालूम था। रुपयों की या किसी फैशनेबल चीज की जरूरत हो, तब तो समझ में भी आए। लेकिन यह लड़की कब किस चीज के लिए खीज उठेगी, यह समझना किसी के वश की बात नहीं थी। बलाई सान्याल ने भी कम कोशिश नहीं की थी।


सबसे उपर कौन – अपने इस उपन्यास में बिमल मित्र जी ने बंटवारे (Partition) का दर्द प्रस्तुत किया है। मुख्य पात्र आबिद एक डॉक्टर हैं जो कि अपना वतन ना“ छॉंड़ने का फैसला लेते हुए हिन्दुस्तान में ही रह जाते हैं। फिर कैसे वो एक अनाथ लड़की का पालन करते हैं ये जानते हुए  कि वो हिन्दु है...बिना किसी की परवाह किए अंत एक पिता का फर्ज निभाते है कहानी इन्ही के इर्द गिर्द घूमती है। 


बिमल मित्र की श्रेष्ठ कहानियाँ – अगर आप लघु कथा प्रेमी है तो बिमल जी की कहानियों का यह संकलन आपको अवश्य पढना चाहिए। हर कहानी आपको  अहसासों का एक नया ही रूप दिखाती है फिर भी मुझे.. नाम, भूखी पीढ़ी, दूसरा पहलू और बेशर्म बेहद पंसद आयी।  जिंदगी के किसी एक खण्ड को द्रर्शाने वाली ये कहानियाँ अखण्ड  हैं.. अपने आप में पूर्ण।

कगार और फिसलन – बिमल मित्र जी के उपन्यास कगार और फिसलन में इनके व्यक्तित्व का नया स्वरूप सामने आता है। पढ़कर लगा ये किसी ऐसे लेखक की रचना है जिसने भारत में इतनी रूढ़ियों के बीच जन्म लेकर अपने लेखन को उन्मुक्त रखा। अगर आपने मुराकामी की स्पुतनिक स्वीटहार्टस’ पढी हो तो आप जान जाएंगे कुछ ही पृष्ठ बाद कि कहानी की मुख्य पात्र मिस श्रॉफ का अंत इतना मर्मांतक क्यूँ था। 

वही इसी किताब की दूसरी कहानी अटल दा, कुंती और इंन्दुलेखा के मध्य घूमती है जो अंत में एक संदेश पर खत्म होती है कि किसी के बारे में पहली नज़र में राय बना लेना आपको मूर्ख साबित करता है और कुछ नहीं। कुल मिलाकर किताब पाठकों को अंत तक बांधे रखती है।


अभी तक बस इतना ही पढ पायी हूँ.. बिमल मित्र जी को.. जानती हूँ काफी कुछ बाकी है शायद यह किताबें ही हैं जिन्दगी में... जो थोड़ा और जीने के लिए मजबूर कर देती हैं...। 

September 12, 2015

ग़ुलज़ार साब की एक नज़्म


पूरे का पूरा आकाश घुमा कर
बाज़ी देखी मैंने

काले घर में सूरज रख के,
तुमने शायद सोचा था, मेरे सब
मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़ जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया.

तुमने एक समन्दर हाथ में ले कर, मुझ
पर ठेल दिया।
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख
दी,

काल चला तुमने और मेरी जानिब
देखा,
मैंने काल को तोड़ क़े 
लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया.

मेरी ख़ुदी को तुमने चन्द
चमत्कारों से मारना चाहा,
मेरे इक प्यादे ने तेरे चाँद का
मोहरा मार लिया

मौत की शह दे कर तुमने समझा
अब तो मात हुई,
मैंने जिस्म का ख़ोल उतार क़े
सौंप दिया,
और रूह बचा ली,

पूरे-का-पूरा आकाश घुमा कर अब
तुम देखो बाजी,
पूरे-का-पूरा आकाश घुमा कर अब
तुम देखो बाजी..

- गुलज़ार साब 
P.s - Tried to recite his Nazm. Found it Inspirational and heartwarming.(ग़ुस्ताखी माफ) 

August 18, 2015

अगस्त गुलज़ार है और ज़िदंगी भी



‘हवाओं पे लिख दो.. हवाओं के नाम’

लफ्ज़ों में, तारीखों में या किसी सिर्फ एक अहसास में इस शख्स को नहीं बांधा जा सकता, जिसने अपने ठिकाने खुद बसाये हों वक्त से परे अगर मिल सको कहीं 

जन्म दिवस है गुल्ज़ार साब का आज, 18 अगस्त 1934, समय भी अपने में नाज़ करता होगा ना, झेलम जो गुलज़ार जी के हर गीत हर नज़्म की रूह में बसती है, वही पास के दीना गाँव में जन्में गुलज़ार जी ने पूरी दुनिया को अपना बना लिया, उनकी नज़्में अंतरिक्ष के सभी फासलें तय कर प्लूटो तक को छू आयीं। माखन सिंह कालरा जी व सुजान कौर जी को शत शत नमन!

‘कल रात से तेरी खूशबू आँखों में ठहरी हुई है’

‘वक्त को आते, न जाते, न गुजरते देखा,
न उतरते हुए देखा कभी इलहाम की सूरत,
जमा होते हुए एक जगह, मगर देखा है’

गुल्ज़ार जी को गूगल सर्च करने पर इंडियन पोएट, लिरीसिस्ट, और डायरेक्टर की संज्ञा से नवाजा जाता है, हांलाकि कई भाषाओ (हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, मारवाड़ी, बृज़, खड़ी बोली) में अपने अहसास पिरोने वाले गुलज़ार साब कहते हैं उन्हे आज भी अतुल्नीय खुशी अपनी कविताओं, अपनी नज़्मों को किसी पत्रिका में प्रकाशित होने पर होती है। आकाश की उंचाईयों को काबू में करने के बाद, जहन में इतनी सादगी को जगह देना, नहीं कर पाता हर कोई, शायद इसलिए ही “गुलज़ार ज़िदंगी हैं, ज़िदंगी गुलज़ार हैं। 


वो उम्र कम कर रहा था मेरी, मैं साल अपने बढ़ा रहा था

बहुत बार सोचा यह सिंदूरी रोगन, जहाँ पे खड़ा हूँ, वहीं पे बिछा दूँ
यह सूरज के ज़र्रे ज़मी पे मिले तो इक और आसमां
इस ज़मी पे बिछा दूँ

हर शख्स आज गुलज़ार् साब की नज़्मों का मुरीद है, उनके लिखे नगमें जीवित कर देते है हमारी जंग लगी संवेदनाओं को, किसी को पढ़कर खुद को पा लेना जादू सा लगता है, किसी की लिखी उदासियाँ भी जब दिल को सूकून पहुचाँ दे, तो ये ज़िन्दगी आसां लगने लगती है।

"प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं एक खामोशी है सुनती है कहा करती है’


तेरे उतारे हुए दिन पहन के अब भी ,
मैं तेरी महक में कई रोज़ काट देता हूँ ,
ना वो पुराने हुए हैं, ना उनका रंग उतरा


दर्द हल्का है, सांस भारी है जिए जाने की रस्म जारी है
आपके बाद हर घडी हमने आपके साथ ही गुजारी है!

सुबह को जन्म देती हर रात, और रात के साथ अठखेलियां करता चांद भी बेकरार रहता होगा, हम पर आज कुछ लिख दें शायद, गहराई तक छूकर सांसे भर दे, गुलज़ार एक बार फिर ज़िन्दा कर दें.. हमें।



‘मासूम सी नींद में जब कोई सपना चले ,
हम को बुला लेना तुम पलकों के परदे तले’


मैं रहता इस तरफ़ हूँ यार की दीवार के लेकिन
मेरा साया अभी  दीवार के उस पार गिरता है
बड़ी कच्ची सरहद एक अपने जिस्मों -जां की है  
(त्रिवेणी)

बारिशें जब भी धरती के लम्स को छूती होंगी तो मौसम की आंखे, गुलज़ार साब की डेस्क पर रखी इठलाती डायरी से उलझ जाती होंगीं, शायद कुछ नया लिखा हो हमारे रिश्ते के बारे में.. रिशता जो बादलों से हैं, सब्ज जमीं पर दूर तक फैले मुस्कुराते फूलों से है, कोई और कहां महसूस कर पाता है इतना, ये ऐनक का हुनर है या ऐनक से झाँकती उन दो मासूम सी आंखों की शरारत, कुछ तो छुपा रहे गुल्ज़ार की नज़रों से, प्राईवेसी जैसा कुछ।

"एक अकेली छतरी में जब.. आधे आधे भीग रहे थे"

"एक सौ सोलह चाँद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल


यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
कितनी सौंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी


"पत्तों के गर चहरे होते, कुछ तेरे कुछ मेरे होते
मौसम चलते पाँव के नीचे, हवा के ऊपर डेरे होते!!"


‘कभी नीले आसमां पर चलो घूमने चले हम, कोई अब्र मिल गया तो ज़मीं पे बरस ले हम’


लब हिले तो मोगरे के फूल खिलते हैं कहीं
आप की आँखों में क्या साहिल भी मिलते हैं कहीं
आप की खामोशियाँ भी आप की आवाज हैं


‘तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं हूँ तेरी क़सम, तेरे ख़यालों में कुछ भूल-भूल जाता हूँ’



अब जब धूप में पिघलती राहों को ही रेशमी कह दे कोई, तो इतंजार धूमिल पड़ने लगता है ना, दर्द खुशी देता है, मंज़िलें ना भी दिखे पर करीब लगती हैं।

इन रेशमी राहों में इक राह तो वो होगी
तुम तक जो पहुचती है इस मोड़ से जाती है

एक बार तो यूँ होगा थोड़ा सा सूकूं होगा ना दिल में कसक होगी ना दिल में जूनूं होगा””


जो गुजर गई, कल की बात थी"


जितने भी तय करते गए, बढ़ते गए ये फ़ासले,
मीलों से दिन छोड़ आए सालों सी रात ले के चले”


कोई वादा नहीं किया लेकिन, क्यों तेरा इंतज़ार रहता है
बेवजह जब करार मिल जाए, दिल बड़ा बेकरार रहता है


कमाल है ना, जो प्रश्न हमारे अश्क अपने मुकद्दर से कर बैठते हैं, उस हर एक परेशानी का जवाब रखता है इक शख्स अपने गीतों की पोटली मे।

ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय ना हुए ,
हज़ार बार रुके हम हज़ार बार चले
(जगजीत जी की आवाज में)


‘जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे, ये मोड़ अब भी वही पड़े हैं’
‘ये मोड़ क्यूँ आते हैं.. रास्ते सीधे क्यूँ नहीं होते?’


‘कहने वालों का कुछ नहीं जाता, सहने वाले कमाल करते हैं,
कौन ढूंढे जवाब दर्दों के, लोग तो बस सवाल करते हैं’


ऐसे बिखरे हैं दिन रात जैसे
मोतियों वाला हार टूट गया
तुमने मुझे पिरो के रखा था 

गुलज़ार जी के बारे में जितना भी लिखो कम ही होगा ना.. जो सब कुछ कह चुका हो, उसको एक छोटे से लेख में बाँधना नामुमकिन है, एक बेमानी सा खेल। 

तुमसे मिली जो जिन्दगी, हमने अभी बोई नहीं, तेरे सिवा कोई न था... तेरे सिवा कोई नहीं’


आ नींद का सौदा करें, इक ख्वाब दें इक ख्वाब लें


लकीरें हाथ में थीं तो मुक़द्दर थीं, इन्हें हम बन्द रखते थे,
ज़मीनों पर बिछीं तो फिर समंदर, मुलक, घर-आंगन सभी को काटती गुज़रीं!"


बस दिली तमन्ना है, हथेली पर बिछी लकीरों में कुछ उल्ट फेर कर सकूं, जोड़-घटाव सा कुछ, गुलज़ार साब का हर इक अल्फाज़, लिखने का कायदा, एक नई उम्र पा जाए। गुलज़ार दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ..!  

''कितनी आवाजें हैं, ये लोग हैं, बातें हैं मगर
ज़हन के पीछे किसी और ही सतह पे कहीं
जैसे चुपचाप बरसता है तसव्वुर तेरा''



और अंत में एक मीठा सा सच—  मुख़्तसर सी बात है तुम से प्यार है..!” 


- Ankita Chauhan  (Last Year , Same Day)