March 14, 2019

Notes : So Much Noise



कल ‘मैन बुकर प्राइज़’ की लॉगलिस्ट अनाउंस हुई, 13 किताबें। इस बार लिस्ट में काफी सारी लेखिकाओं के काम को जगह दी गयी, यह देखकर खुशी हुई, साथ ही छोटी इंडीपेडेंट प्रेसेज़ से प्रकाशित काम को भी शामिल किया गया।

मैंने, अब तक लिस्ट में से एक भी किताब नहीं पढ़ी, अजीब लगा। थोड़ा बहुत पाते हैं, कितना कुछ छूट जाता है। सारी तो नहीं लेकिन इन चार किताबों को अपनी टू-बी-रीड पाईल में शामिल किया है, इस साल इन्हें जरूर पढ़ना है।

Jokha Alharthi - Celestial Bodies (Sandstone Press Ltd)
Annie Ernaux - The Years (Fitzcarraldo Editions)
Hwang Sok-yong - At Dusk (Scribe, UK)
Samanta Schweblin - Mouthful Of Birds (Oneworld)

जब हिन्दी की किताबें नहीं पढ़ती तो हिन्दी के शब्द भूल जाती हूँ, वहाँ भी करीब बीस किताबें अनटच्ड रखी हैं, टेड़ी लकीर, हर बारिश 
में, लखनऊ की पाँच रातें...।

इस साल ट्रांसलेशंस पढ़ने का ज्यादा मन है, नहीं पता ये किसी और के साथ होता है या नहीं, लेकिन जब काम करती हूँ, तो सोचती हूँ ऐसा क्या लिख दूँगी जो पहले नहीं लिखा गया, इससे अच्छा पढ़ लेती हूँ, कितना कुछ सीखना है, कुछ भी तो नहीं आता।

जब किताब खोलती हूँ तो रिग्रेट होता है, कितना सारा काम बचा है, जरूरी है, इस उलझन में मन गिल्ट से भर जाता है, मूवी देखते वक्त भी सेम फीलिंग, स्क्रीन टाईम महज़ 15 मिनट।

कितने सारे डायरेक्टर्स हैं, जिनका पूरा काम देखने का मन है, Satyajit Ray, Maniratnam, Vittorio-de-sica, Jean-luc-godard, Andrei-tarkovsky, Louis-malle, Krzysztof-kieslowski, सत्यजीत रे का काम तो पढ़ना भी है, आधा-पौना पढ़ के किताब दूसरे किनारे रख दी।

फिर लगता है, क्या करना है इतना सब ज्ञान लेकर, सब फालतू है, म्यूजिक सुन लूँ काफी है, अबिदा परवीन, बेखम अख्तर, इक्बाल बानो को सुनते हुए पूरी उम्र बिताई जा सकती है, “राम करे कहीं नैना ना उलझे”


फिर आता है... प्लूटो, जब पास होता है, तो सारी दुनिया बेमतलब लगती है, जिद करके ऐसे गले से चिपक जाता है, स्टैच्यू बन जाती हूँ... क्या मैं बहुत ज्यादा पागल हूँ?