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September 11, 2023

सत्यजीत राय - सोने का किला । फेलूदा सीरीज़ - जासूसी उपन्यास


किताब: सोने का किला
लेखक: सत्यजीत राय
प्रकाशक: राजकमल बुक्स 
पेपरबैक: 120 पृष्ठ  


सत्यजीत राय की फेलूदा सीरीज़ से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो। किशोर पाठकों के लिए लिखी गई यह किताब सोने का किलाएक जासूसी उपन्यास है। राजस्थान की नींव पर खड़ी यह रहस्यमयी कहानी, बीकानेर, किशनगढ़, जोधपुर, और जैसलमैर जैसी कई जगहों की संस्कृति, और अनूठे वातावरण में गुँथी है।

यह मुकुल कथा है, एक ऐसे बच्चे की कहानी जिसे अपने पिछले जन्म की बातें याद हैं। उसे सपनों में सोने का किला दिखता है, साथ ही युद्ध का मैदान और उसके पार अपना घर।

मुकुल की व्यथा को दूर करने के लिए उसे राजस्थान ले जाया जाता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब उसके यात्रा पर निकलते ही पड़ौस में रहने वाले बच्चे को मुकुल समझकर अग़वा कर लिया जाता है। उसके पिता की विनती पर मुकुले के पीछे-पीछे एक जासूस को राजस्थान यात्रा पर भेजा जाता है, और कहानी में पदार्पण होता है, जनाब फेलूदा का, पूरा नाम प्रदोष मित्तिर। सोने का किला और उसमें ग़ढ़ा खजाना, खजाने को पाने की लालसा लिए कुछ बदमाश – पूरी कथा इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। कई मकड़जाल और उनसे पार निकलते फेलूदा। यह उपन्यास हर उम्र के पाठकों के लिए है - सहज और पठनीय। किताब में बने स्कैच सत्यजीत राय ने ख़ुद उकेरे हैं।    

किताब का अंश  

“पूर्व जन्म की कथा कहने वालों का मुझे पता है। कुछेक लोग होते हैं जिन्हें हठात पूर्व जन्म की बात याद आ जाती है। उन्हें बांग्ला में 'जातिस्मर' कहते हैं। लेकिन वास्तव में पूर्व जन्म जैसा कुछ होता है ऐसा फेलूदा भी नहीं जानते हैं। फेलूदा ने चार मीनार का पैकेट खोलकर उन साहब की तरफ बढ़ाया। उन्होंने मुस्कराकर सिर हिलाया और कहा कि वे सिगरेट नहीं पीते हैं। इसके बाद वे बोले, आपको शायद याद होगा कि मेरे लड़के की उम्र आठ साल है-एक स्थान का वर्णन करता हुआ कहता है कि यह भी वहाँ गया था। लेकिन उस स्थान पर मेरा बेटा तो क्या मेरे बाप-दादे भी नहीं गए थे। कैसे गरीब-गुजरान करते हैं हम लोग यह तो आप जानते ही हैं। दुकान भी आपने देखी ही है, और इधर तो किताबों का व्यापार दिन-ब-दिन।

आपका लड़का तो एक किले की बात करता है ना?' फेलूदा ने बीच में ही उन्हें रोककर पूछा। "जी हाँ. कहता है कि सोने का किला। उस पर तोपें रखी हैं, युद्ध हो रहा है. आदमी मर रहे हैं। यह सब वह देख रहा है। वह खुद पगड़ी बाँधे ऊँट पर बैठा बालू के टीलों पर घूमता था। बालू की बात बहुत करता है। और हाँ, मोर की भी बात बताता है तथा हाथी घोड़ों की बात भी उसके हाथ पर कोहनी के पास एक दाग है जन्म से ही हम तो इसे जन्मदाग की समझते थे लेकिन वह कहता है कि एक बार मोर ने वहाँ चोंच की चोट मारी थी यह उसी का दाग है।" 

मानव कौल - रूह । कश्मीर यात्रा पर आधारित

 



किताब: रूह 
लेखक: मानव कौल
प्रकाशक: हिंदी युग्म
विधा: यात्रा-संस्मरण 
पेपरबैक: 175 पृष्ठ

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मानव कौल की यह किताब 'रूह', कश्मीर पर लिखा गया यात्रा-संस्मरण है। यात्रा बाहरी से कहीं अधिक भीतरी। मन में चलती उठा-पठक और नॉस्टालजिया। समकालीन विषयों से इतर, यहाँ मानव की नज़र से कश्मीर दिखता है। कश्मीर जो उनका घर था, वह जिस मनोभाव से घर की दीवारों-दरवाज़ों को अपने लिखे में जीवित करते हैं, सराहनीय है।

दृश्य, जब वह बचपन में मौजूद लोगों को अपने सामने पाते हैं, सुंदर है। मानव खुद कहते हैं कि ये कश्मीर के ज़्वलंतशील मुद्दों को केंद्र में रखकर लिखी गई किताब नहीं है। यह डॉक्यूमेंटेशन है, एक ऐसे बच्चे का जिसका जीवन उस एक क्रूर हादसे ने बदल कर रख दिया।

किताब में एक अन्य पात्र, रूहानी जो पूरी यात्रा में उनके साथ है, ‘बहुत दूर कितनी दूर होता है’ में भी आप इसी तरह के पात्र से रू-ब-रू हुए होंगे। क्या ये पात्र काल्पनिक हैं? नाम भले अलग हों, लेकिन वे प्रतिरूप होने का आभास देते हैं, यह दोहराव पाठक को ज़रा विलगाता है।

अगर आप मानव कौल को पहली दफ़ा पढ़ रहे हैं तो यह किताब जादू-सी लगेगी।

ईमानदार राय रखूँ तो मानव ने जितना खुद को ‘बहुत दूर कितना दूर होता है’ में रचा है, ‘रूह’ उस उँचाई को छूने से ज़रा चूक गई। सनद रहे, इनकी किताबों के ज़रिए अनगिन हिंदी पाठक तैयार हो रहे हैं। और यह एक उपलब्धि है। किताब का एक अंश साझा कर रही हूँ -

सन् 1988 के बाद से जो भी घटा था इस वादी में, और वादी से निकल गए सारे परिवारों ने जो सहा था, उन सब लोगों की कहानियों को अगर हम सुनना शुरू करेंगे तो हमें अपनी इंसानियत पर शर्म आने लगेगी। जिस तरह बाहर रह रहे कश्मीरी पंडितों को छूते ही वे फूट पड़ते हैं, ठीक वैसे ही यहाँ रह रहे कश्मीरी मुस्लिम भी पुरानी घटनाओं पर फट पड़ते हैं। लेकिन इन सबमें पंडितों का कश्मीरी मुस्लिम और कश्मीरी मुस्लिम का पंडितों के प्रति स्नेह भाव ख़त्म नहीं हुआ है। यहाँ घूमते हुए जब भी किसी को पता चलता है कि मैं पंडित हूँ, ठीक उसी वक़्त से हमारी बातचीत में एक अपनापन आ चुका होता है। 'इसे सब पता है' वाला एक भाव दोनों के संवादों में रहता है। अब जो पंडितों की नई पीढ़ी है, उसे घटनाओं की सुनी हुई जानकारी है, जिन्होंने उन घटनाओं को जिया था वे या तो बहुत बूढ़े हो चुके हैं या वे अब नहीं रहे। कश्मीरी मुस्लिम बच्चे जो उस वक़्त बड़े हो रहे थे, या जो पंडितों के बच्चे यहाँ से नहीं गए थे, उनके बचपन के जिए हुए की छाप उनके चेहरे... पर साफ़ दिखती है। 'तुम लोग तो चले गए थे, मैं इस वाक्य के पीछे का मर्म समझ सकता हूँ।

September 24, 2022

Pratinidhi Kahaniyan - Muktibodh and Ismat Chughtai

 

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पता नहीं क्यूँ मैं बहुत ईमानदारी की ज़िंदगी जीता हूँ, झूठ नहीं बोला करता, पर-स्त्री को नहीं देखता, रिश्वत नहीं लेता, भृष्टाचरी नहीं हूँ, दगा या फरेब नहीं करता, अलबत्ता कर्ज़ मुझपर जरूर है जिसे मैं चुका नहीं पाता। फिर भी कमाई की रकम कर्ज़ में जाती है। इस पर भी मैं यह सोचता हूँ कि मैं बुनियादी तौर से बेईमान हूँ। इसलिए, मैंने अपने को पुलिस की ज़बान में उठाईगिरा कहा। मैं लेखक हूँ। अब बताइए, आप क्या हैं?’

-    मुक्तिबोध, अपनी एक कहानी में

 

उनके देहान्त के बाद न जाने क्यों, मरने वाले की चीज़ें प्यारी हो गयीं। उनका एक-एक लफ़्ज़ चुभने लगा। और मैंने उम्र में पहली बार उनकी किताबें दिल लगाकर पढ़ीं। दिल लगा कर पढ़ने की भी खूब रही। गोया दिल लगाने की भी ज़रूरत थी। दिल आप-से-आप खिंचने लगा। ओफ़्फ़ोह! तो यह कुछ लिखा है इन मारी-मारी फिरने वाली किताबों में! एक-एक शब्द पर उनकी तस्वीर आँखों में खिंच जाती और पल भर में वो ग़म और दुख में डूबी हुई, मुस्कराने की कोशिश करती हुई आँखें, दुखभरी काली घटाओं की तरह मुरझाये हुए चेहरे पर पड़े हुए वो घने बाल, वो पीला नीलाहट लिये हुए ऊँचा माथा, उदास ऊदे होंठ, जिनके अन्दर समय से पहले तोड़े हुए असमतल दाँत और दुर्बल, सूखे-सूखे, औरतों-जैसे नाज़ुक, और दवाओं में बसी हुई लम्बी उँगलियों वाले हाथ। और फिर उन हाथों पर सूजन आ गयी थी। पतली-पतली खपच्ची-जैसी टाँगे, जिनके सिरे पर वरम से सूजे हुए भद्दे पैर, जिन्हें देखने से बचने के लिए हम लोग उनके सिरहाने की तरफ़ ही जाया करते थे और सूखे हुए पिंजर-जैसे सीने पर धौंकनी का सन्देह होता था। कलेजे पर हज़ारों कपड़ों, बनियानों की तहें और इस सीने में ऐसा फड़कता हुआ चुलबुला दिल! या अल्लाह, यह आदमी क्योंकर हँसता था। लगता था, कोई भूत है या जिन्न, जो हर ख़ुदाई ताक़त से कुश्ती लड़ रहा है। नहीं मानता, मुस्कराये जाता है। ज़ालिम और जाबिर ख़ुदा चढ़-चढ़ कर खाँसी और दमे की यन्त्रणा दे रहा है और यह दिल ठहाके लगाना नहीं छोड़ता। कौन सा दुनिया और दीन का दुख था, जो कुदरत ने बचा रखा था, फिर भी रुला न सकी। इस दुख में, जलन में हँसते ही नहीं, हँसाते रहना किसी इन्सान का काम नहीं। मामू कहते थे, ‘ज़िन्दा लाश।ख़ुदाया! अगर लाशें भी इस क़दर जानदार, बेचैन और फड़कने वाली होती हैं तो फिर दुनिया एक लाश क्यों नहीं बन जाती!

-    इस्मत चुगताई  


May 28, 2022

Observations: Ret Samadhi - Geetanjali Shree | Daisy Rockwell

 


हिन्दी में लिखी एक किताब का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाना क्या मायने रखता है? राजस्थान के एक बहुत ही साधारण कस्बाई शहर में एक साधारण से घर में सुबह छः बजे से हलचल मची है, रात को इंतज़ार करते हुए सो गए, सुबह ट्वीटर पर पढ़ा कि बुकर प्राइज़ इस बार हिन्दुस्तान आ रहा है। गीतांजलि श्री ने अनुवादक डेज़ी रॉकवैल के साथ मिलकर वाकई इतिहास रच दिया है।

यकीं करना मुश्किल है। लेकिन ये हुआ है। हिंदी को इतनी  ऊँचाई पर देखना आँखों के फोकस को फिर से सेट करने जैसा है। और जब बात भारत की हो तो ये और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, कठोर सच है लेकिन यहाँ रीडिंग कल्चर इतना विस्तृत नहीं है। यकीं मानिए मेरी मुठ्टी भर किताबों की अलमारी को देखकर लोग अचरज से भर जाते हैं। यहाँ बताना चाहूंगी, मेरा शहर एक टाइगर सेंचुरी होने की वज़ह से विश्व भर में जाना जाता है लेकिन यहाँ किताबों की (कोर्स की किताबों के इतर) एक भी दुकान नहीं है। जो कह रहे हैं एक किताब क्या ही बदलाव लाएगी, तो ये कुछ मोमेंट्स जो मैंने कल के दिन अपने आस-पास घटते देखे।

१. जब पापा को बताया तो पापा ने पहली बार मेरी बुकशेल्फ़ का कांच खिसकाया और रेत-समाधि निकाली, अलट-पलट के देखा, एक पेज पढ़ा, बैक-कवर पर लिखा हर एक शब्द धीरे-धीरे पढ़ते गए। श्री की किताबों को जो कि विधा अनुसार जमी थीं, निकालकर एक साथ रखने लगे, मेरे मना करने के बावजूद। साधारण सी बात है ना, मेरे लिए बहुत अहमियत रखती है।  जब आपके काम के फ़ील्ड को सिर्फ़ शौक़ की तरह ना देखकर उसे अहमियत मिलती है, सम्मान मिलता है तो आप महसूस करते हैं कि ज़िंदगी धीमी ही सही लेकिन सही दिशा में है। गीतांजलि श्री ने जाने कितनी लड़कियों को आज आत्मविश्वास की चाबी थमाई है।   

२. ज़माने से भूले दोस्तों के मैसेज कई ज़रिए तलाशते हुए, कल मेरे पास आए। रेत समाधि पढ़नी चाहिए? कैसी किताब है? किताब से जुड़े सवाल तो मिलते रहते हैं, मैं भी सबसे पूछती रहती हूँ, प्रियंका दुबे जी से तो बेधड़क पूछ लेती हूँ और वह कभी निराश नहीं करते। लेकिन कल सवालों की जैसे बाढ़ सी आई हो। गीतांजलि श्री की कृति ने वही किया है जो अच्छा साहित्य करता है। लोगों को जोड़ता है, खाई को पाटता है, जो कि उन्होंने अपनी किताब में भी लिखा है, किताब में सरहद पर लिखे अंश को मैंने जाने कितनी बार पढ़ा होगा।

३. ट्वीटर पर मेरी टाइमलाइन पर ढेरों पोस्ट्स थे जहां एक ही बेचैनी दिखी — स्कूल के बाद तो हिंदी की किताब कभी उठाई ही नहीं गई — हिंदी पढ़ना तो मुश्किल है ही, किताबें उपलब्ध भी नहीं होतीं, जब आपके सामने इतने ऑप्शन रखे हों, तो जद्दोजहद करके एक हिंदी की किताब ढूंढ निकालना, समय किसके पास है? मुझे तो कई बार टोका जाता है, किताब पढ़ो, किताबों के बारे में लेख पढने से क्या होगा। मुझे पसंद है, जानना कि, क्या पढ़ा जा रहा है। मेरी टैब में इतनी लिट् मैगजींस के टैब्स बुकमार्कड रहते हैं। जब लेखकों को किताबों के बारे में बात करते देखती हूँ तो उम्मीद से भर जाती हूँ। किताबों का होना दरअसल घर का होना है, पैरों के नीचे ज़मीन का होना है। गीतांजलि श्री का ये एक उपन्यास जाने कितनी हिंदी की किताबों को नया घर देने वाला है, आप इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते। 



४. किताब का अनुवाद डेजी रॉकवैल ने किया है, आप उनके बारे में जाकर पढ़िए, अनुवादक अक्सर बैकसीट पर बैठते हैं, लेकिन देखा जाए तो अनुवादकों के बिना दूसरी भाषा के शब्द हमारे लिए कुछ काले स्याह अक्षरों से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। जब यह किताब लॉन्गलिस्ट हुई तो विवेक तेजुजा जो कि खुद एक शानदार लेखक हैं, उन्होंने रॉकवैल से इस पर बात की, वह बातचीत आपको उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर मिल जाएगी। रॉकवैल चेहरे पर मुस्कान लिए एक एक कर सवालों के ज़बाव देती चलती हैं, उनकी आवाज़ में शब्दों में संजीदगी है। वे एक बेहतरीन आर्टिस्ट भी हैं। ज़ाहिर है रेत-समाधि की यह सफलता  अनुवादकों के लिए भी सम्मान पैदा करेगी।

 

५. कित्ताब का अंग्रेज़ी अनुवाद Tilted Axis Press से आया है। जो कि एक इन्डीपेंडेंट पब्लिशर हैं। इसकी नीँव Deborah Smith ने 2015 में रखी थी। स्मिथ Han Kang की किताब The Vegetarian की अनुवादक हैं। ये पब्लिशिंग हाउस कंटेम्पररी एशियन लिटरेचर को बढ़ावा देता है। Arunava Sinha द्वारा अनुदिन Abandon यहीं से प्रकाशित है। संगीता बंद्योपाध्याय की किताब का बेहतरीन अनुवाद किया गया है। मूल कृति नहीं पढ़ी लेकिन उस किताब के दृश्य अभी तक haunt करते हैं। Anurava Sinha ji का तो सारा काम ही पढ़ लेना चाहिए।

 

६. रेत-समाधि २०२० में खरीदी थी। राजकमल प्रकाशन ने हाल में इसका नया संस्करण निकाला है जिसका कवर काफ़ी tempting है। मैं एक किताब के कई संस्करण नहीं ले पाती लेकिन इसका लेना चाहूंगी। किताब के कवर पर मौजूद पेंटिंग रॉकवैल जी की है। जो कहानी की पूरक है।    

७. कुछ दिन पहले प्राईमरी में पढ़ने वाली एक बच्ची ने एक सवाल किया था कि — इन किताबों को पढ़ने से क्या होता है? मैंने उस वक़्त तो यही कहा था, आपकी समझ बढ़ती है, अच्छे इंसान बनते हो। रेत-समाधि के बारे में मीडिया में पढ़कर, देखकर, शायद अब ये सवाल और भी कई बच्चे पूछेंगे। खुद से किया एक सही सवाल नए रास्ते खोलता है।  

८. गत वर्ष क्लबहाउस पर चन्दन पाण्डेय जी की किताब वैधानिक गल्प पर एक सेशन रखा गया था, वास्तव में बात अनुवाद पर हो रही थी, Legal Fiction, अनुवादक भारत भूषण तिवारी जी भी मौजूद थे। सवाल पूछने का मौक़ा मिला। तब रेत समाधि और उसके अनुवाद ‘टूम ऑफ़ सैंड’ को मेंशन किया था। उस पर फिर बात भी हुई। अच्छा साहित्य किस तरह अपनी जगह साधता है।  

ये सब कल लिखना चाहिए था। कल इतना खुश थी, आँखें भरती रही खाली होती रहीं, पागलपन हैं ना। राजकमल प्रकाशन समूह को, गीतांजलि श्री जी को ढ़ेरों शुभकामनाएं और डेज़ी रॉकवैल को दिल से शुक्रिया।  

 


November 01, 2021

मोहित कटारिया की नज़्में - कच्चे रंग

 


किताब – कच्चे रंग
लेखक – मोहित कटारिया
प्रकाशक – वाणी प्रकाशन (2019)
विधा – कविता-संग्रह (नज़्में) 
आईएसबीएन -  9789389012255
पृष्ठ -  140

मोहित कटारिया अपनी नज़्मों के पहले संग्रह कच्चे रंग में मानवीय संवेदनाओं और प्रकृति के इर्द-गिर्द एक दुनिया बुनते हैं। वो खुद मानते हैं कि कविता मुझे हर एहसास को ठहरकर महसूस करने के लिए प्रेरित करती है, कविता लिखना मेरे लिए बुनाई करने जैसा है,’ एकांत और जिजीविषा को गर एक भाषा मान लें तो ये नज़्में उसी भाषा के परिसर में टहलती नज़र आएंगी। उनके लफ्जों में छुपा मौन कभी सुकून पहुंचाता है तो कभी सोच पर हल्की दस्तक छोड़ जाता है।

मोहित कटारिया की नज़्मों को पढ़ना, अपने भीतर लौटने जैसा है, कुछ-कुछ सूफी रंग ओढ़े वो इन कच्चे रंगों से नए समय की कविताएं रचते हैं। पुरानी परंपरा को निभाए बिना कवि जैसे खुले आकाश में बिम्ब बुन रहा हो। उनका शिल्प कहीं-कहीं गुलज़ार साब से प्रेरित लगता है जैसे गुलज़ार के विस्तृत आँगन में एक कोंपल ने उगने की जिद में जगह तलाश ली हो।

मोहित कटारिया ने अपनी किताब को सात इंद्रधनुषी हिस्सों में बांटा है, मानवीय भावों से सींचे ये सात खंड उनके तजुर्बे और नजरिए का विस्तार हैं। वो लिखते हैं̶

और वक़्त की बेकरां रस्सी पे
एक नुक्ते-सा मैं,
बस उलझा हुआ हूँ,
अपने ही ज़रा से तजुर्बे में

मोहित अपनी एक नज़्म में लिखते हैं दर्द की सोच हमेशा/ दर्द से बड़ी होती है वो मानते हैं कि ̶ दर्द को भी इतनी खूबसूरती से अभिव्यक्त किया जाता है कि वो कविताई हो जाता है। मुझे शायर की ये नज़्में लफ्जों में ज़्यादा उनकी सतहों में महसूस हुईं। ये नज़्म देखिए ̶  

 

अब मैं सिर्फ
ख्वाबों में रोता हूँ 
कुछ चेहरे
जो अब हक़ीक़त में दिख नहीं सकते
उनके नक़्श उकेरता हूँ
अपनी नींदों में
और बतियाता हूँ रात भर उनसे
अजीबो-गरीब सी भाषा में
कि जानता नहीं हूँ भाषा
उस जहान की मैं
और ये भी नहीं जानता
कि क्या याद होगी उन्हें अब तक
भाषा इस जहान की?
इसी उधेड़बुन में
करवटें बदलते हुए नींद के आगोश में
मैं हर रात उसी सूने बिस्तर पर सोता हूँ
और हाँ,
अब मैं सिर्फ नींदों में रोता हूँ।

मोहित कटारिया का लेखन, अनंत में छिपे मौन की तलाश हैं। उनके ख्यालों के बीच होड़ लगी है कलम से होकर कोरे कागज़ पर बिखरने की। कभी वो बारिश को रूपक की तरह रखकर उन आँखों से कभी-कभार ही बरसने की प्रार्थना करते हैं, उनकी आँखों के किनारे में अकारण अटके उस आँसू को कायनात का दर्ज़ा देते हैं, फिर उसी संवाद का दूसरा सिरा पकड़े जवाब भी खुद ही लिखते हैं कि कुछ पौधे सिर्फ पानी में ही सांस लेते हैं

कवि कि हथेलियाँ कहीं सिक्कों के भेष में रिश्तों की परख करती हैं कहीं उनका भोला मन, दोस्त की नाराज़गी के इशारे पढ़ने की जद्दोजहद में लगा है।

मोहित की नज़्मों में इक मासूमियत झलकती हैं वो रिश्तों की नाज़ुक रगों को बखूबी समझते हैं, अपनी एक नज़्म डर में वो लिखते हैं ̶

इसलिए डरता हूँ
बरसों से अनछुए,
कुछ रिश्तों को छेड़ने से

सोचता हूँ –
गुज़रे वक़्त के साथ हो ना गएँ हों
वो भी सीले-सीले से...

मोहित प्रकृति के प्रेम में हैं, ये उनकी नज़्मों में जाहिर हैं, वो रात के आसमां को काली चादर कहकर पुकारते हैं जिससे छन-छन कर रोशनी आती है, प्रकृति के अचंभे में डूबा उनका मन खुद से सवाल करता है जाने कौन है दूजी ओर/ जो इतनी रोशनी रखता है। कवि रात को एक बुढ़िया के समरूप देखते हैं जिसे ठहरने की इजाज़त नहीं है। गुलज़ार साब के निवास स्थान बोस्कियाना में बिताई एक दोपहर को ध्यान में रखते हुए वो लिखते हैं ̶  

बिछा के एक आसमान पूरा
खींच दी शाम की, धुंधली सी चादर उस पे
फिर लिए मुट्ठी में चंद तारे
और छिड़क दिए उस चादर पर...

कच्चे रंग शीर्षक नज़्म में कवि तितलियों के पंखों से उँगलियों के पोरों पर रह गए रंग का मिलान, ज़ेहन पर छूटे रंगों से करते हैं। उनकी संवेदनशील आँखें एक साधारण से घोंसले के बनने में भी तिनकों से ज़्यादा उम्मीद और हौंसले को तज़रीह देती हैं।

लिखना चाहता हूँ मैं,
सिकुड़ते रिश्तों और फैलती दूरियों के बारे में
जो एक बार घर कर लेती हैं
तो एक ही घर में कई घर बन जाते हैं
इंसानी जंजीरों जैसे…’

यहाँ मैं एक छोटी सी कोशिश कर रही हूँ इन नज़मों के सत्व को इस लेख में बांधने की, इस यकीन के साथ कि मोहित कटारिया की ये नज़्में पाठक के दिल तक का रास्ता खुद तय करेंगी। अशेष शुभकामनाएँ।    

कुछ सब्र हम में कम था कुछ खुद पर था भरोसा
जहां नसीब बंट रहा था वो कतार छोड़ आए

लेखक के बारे में

राजस्थान में पले-बढ़े। शिक्षा से कंप्यूटर इंजीनियर। पेशे से एक मल्टीनैशनल कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर। जज़्बे से कवि और लेखक। पिछले चौबीस साल से कविता लेखन करते हुए पंद्रह सौ कवितायें लिख चुके हैं। नवनीत, काव्या, चकमक जैसी राष्ट्रीय  स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित कवितायें। तीन नाटकों का अनुवाद – दम-ए-तस्लीम, मिराज, अश्क नीले हैं मेरे। इनकी कवितायें कई लघु फिल्मों में इस्तेमाल की गई हैं। कच्चे रंग, मोहित कटारिया का पहला कविता संग्रह है।   

P.S. Can’t thank you enough Pavan Jha (Da) for this gifted copy.

 

October 27, 2021

कवि की मनोहर कहानियाँ – यशवंत व्यास

 


किताब – कवि की मनोहर कहानियाँ
लेखक – यशवंत व्यास
प्रकाशक – खटाक (2021)
विधा - हास्य व्यंग्य
आईएसबीएन -  9781637455661
पृष्ठ - 121

यशवंत व्यास ने अपनी किताब कवि की मनोहर कहानियों के ज़रिए वर्तमान समय में कवियों के अस्तित्व का जैसे एक्स-रे खींचने की कोशिश की हो। वास्तविकता को हास्य-व्यंग्य के माध्यम से कहना सिर्फ भाषाई जादू नहीं होता। ये व्यंग्य लेख हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में मौजूद कई जटिल सवालों को सहजता से हल करते हैं। कुल पचास लेखों में सिमटी ये किताब सिर्फ शब्दों की तिकड़म नहीं, हमारे समय पर की गई टिप्पणी है। कवि के जीवन में दिन-रात चलती एक उथल-पुथल से इस किताब की शुरुआत होती है –

 

कवि कहता है, नाव बनाना मामूली काम है।
वह ऐसे मामूली काम क्यूँ करे?
वह महान काम के लिए पैदा हुआ है।
नाव तो किसी ऐरे-गैरे से बनवा लो
जो लकड़ी ठोंकना जानता हो
कवि तो कविता ठोंकता है।

इन लेखों में गंभीर मसलों को व्यंग्य की धार पर रखकर कई दृश्य विवरण उकेरे गए हैं। कवि सिर्फ कवि होना चाहता है जबकि वो जिस समाज में रहता है उसकी जटिलताओं से अछूता रहना नामुमकिन है। उसकी निगाह हर स्तर को भेदती है। चाहे वो मानवीय संबंध हों या हमारे इर्द-गिर्द फैली विसंगतियाँ। एक कवि जिंदगी चलाने के लिए की जाने वाली जद्दोजहद से भी जूझता नज़र आता है।   

कवि का बॉस बादल गया लेख में यशवंत व्यास कहते हैं ̶ भौतिक दृष्टि से जहां उसकी नौकरी है, वहाँ उसका बॉस भी है। दार्शनिक दृष्टि से कवि तो कभी नौकरी करता नहीं, बस ये व्यव्स्था का संताप है जिसे वो सह रहा है

इसके अलावा कवि के पिता स्वर्गवासी हुए, नौ सौ लाईक्स मिले’, कवि को भूख लगती है पूर्वजों की जंग खाई दुनाली और जब कवि ने हेयर कटिंग सैलून खोला जैसे शीर्षक गुदगुदाते हैं।

वहीं दूसरी तरफ कवि स्टार्ट-अप में लगा के जरिए एक तरह से लेखन में पे-स्केल पर चोट की जाती है ̶ एक कविता पर एक चाय फ्री। दो कविता पर दो चाय और मठरी भी फ्री

जब कवि महोदय इन स्टार्ट-अप से बेज़ार होकर डकैती में उतरते हैं तो उन्हें आभास होता है कि मिड डे मील, ये इतिहास की सबसे बड़ी डकैती थी 

यशवंत व्यास ने साहित्य-आलोचकों को भी अपने लालित्य में यथा-संभव सम्मान दिया, वो कहते हैं कवि एक दिन बोर हो गया, उसने बोरियत को बोरे में भरा और आलोचक के घर के बाहर रख आया। आलोचक से बड़ा कौन? उसके घर तो बोरियत के बोरे ही बोरे।

 


यहाँ इसी किताब से दो व्यंग्य लेखों के अंश साझा कर रही हूँ –

कवि एक बार अफवाह के धंधे में उतरा: कविताई, अफवाह से ज़्यादा सुरक्षित है, कविता में वो देह हो या समाज – कहीं भी घुस जाता है और सुरक्षित निकल आता है।

कवि मनाली गया: पहाड़ों पर उसे प्रेम इसलिए आता है कि वहाँ ऊंचाई होती है और अकेलापन होता है। शिखर के अकेलेपन में भय और शांति दोनों होते हैं। कवि इसपर ग्रंथ लिखना चाहता है। ज़ाहिर है ग्रंथ आएगा तो भीड़ होगी, भीड़ होगी तो माहौल बनेगा और माहौल भी भय के साथ भरोसा देता है। कवि भय पैदा करना चाहता है, बदले में भरोसा लेना चाहता है। भरोसे का सौदा एजेंडे पर है।

यशवंत व्यास अपनी किताब के आख़िर में कवि के आत्म-साक्षात्कार से भी गुजरते हैं, जिसकी स्मृतियाँ पवित्रीकरण के बाद अपने स्नानघर में दर्ज की थी। किताब की समाप्ति फटी डायरी के साबुत पन्ने से होती है।

मेरा व्यंग्य-कृतियों से अब तक इतना मेल-मिलाप हुआ नहीं है, अगर याद करूँ तो राग-दरबारी और निठल्ले की डायरी’, यही कुल दो किताबें पढ़ीं हैं। अगर आप इस विधा में रुचि रखते हैं, और व्यंग्य लेखों को पढ़ना पसंद करते हैं तो ये किताब इस ज़मीन पर नए रास्ते खोलेगी।  


P.S. Thank you Pavan Da for this gifted copy.

 

 

April 18, 2021

मनीषा कुलश्रेष्ठ का कहानी संग्रह ‘किरदार’: मन की भीतरी सतह पर चलता जीवन

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एक अच्छी कहानी हमारे भीतर ठहरे कई विश्वासों को चुनौती देती है, सवाल खड़े करती है, सोच के स्तर पर इंसान को पूरी तरह बदल देने का जज़्बा रखती है।

 मनीषा कुलश्रेष्ठ के कहानी संग्रह किरदार को पढ़ते वक्त कोशिश यही रही कि अपने लिए कुछ नोट्स लिख सकूँ,  किताब को पढ़ने का अनुभव जैसा कुछ। इस कोशिश में किताब कई-कई बार पढ़ी गई। 

 

इन कहानियों में शिल्प और भाषा एक लय में बहती हैं, नए ताज़ा शब्द, अनछुई उपमाएँ, प्रकृति और विज्ञान का समावेश, इस संग्रह को एक ऊंचे पायदान पर स्थापित करता है।  किरदारों के बीच बहते संवाद, मन के भीतरी सतह को कुरेदती संवेदनाएँ, एक नई सोच का सृजन करते अनुभव, जैसे जीवन-राग से मुट्ठी भर रेत उठाकर लेखक ने एक कलाकृति बना दी हो।

 

मनीषा कुलश्रेष्ठ का लेखन हर कहानी के पीछे किरदारों की बेचैनी, बेनियाजी, लिहाज, झिझक, बेसब्री और बेअदबी को इस संग्रह में विन्यस्त करता चलता है।

 

कुछ कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं, उनके किरदार अपने अनुभवों के साथ आपके साथ चलते हैं, कभी किसी दिन खिड़की से यूं ही बाहर देखते हुए या किसी बस स्टॉप पर इंतज़ार करते हुए वो हू-ब-हू आपके सामने आकर खड़े हो जाते हैं, आप अचरज में पड़ जाते हैं कि कैसे वो आपके व्यक्तित्व का हिस्सा हो गए, मनीषा कुलश्रेष्ठ की कृति किरदार’, ऐसी ही कहानियों का गुच्छा हैं

   

इस किताब में मुझे सबसे संवेदनशील कहानी लगी, लापता पीली तितली

 

एक पीली तितली लापता हुई थी। वह उसके जीवन के उन दिनों की बात है जब मौसम, वक्त और उम्र की गिनती तक नहीं पता होती थी। हर एक दिन एक उत्सुक रोशनी लिए उगता था। सूरज बतियाता, चाँद कहानियाँ सुनाता। जब वह पाठशाला तक नहीं जाती थी तो हर दिन उसके लिए एक पाठशाला होता था। हथेली पर रखी रेशम की गुड़िया और बाँह पर साथियों की चिकोटी, जांघ पर चलते मकोडों की गुड़गुड़ी तक नई लगती थी

 

इस कहानी में बिना बाल-शोषण शब्द का इस्तेमाल किए, बचपन में एक बच्ची के साथ घटी अनहोनी को उकेरा गया है, ये इस संग्रह की सबसे जीवंत कथा है, चित्रात्मक भाषा के माध्यम से उस बच्ची का दर्द, उलझन, तड़प, कहना कितना मुश्किल रहा होगा, लेखक ने जैसे कहानी को जिया हो, पाठक वो टीस भीतर तक महसूस करता है।

 

वहीं दूसरी कहानी ऑर्किड में मणिपुर का जनजातीय जीवन और उसके इर्द-गिर्द उठता संघर्ष है।  कहानी की नायिका पढ़ी-लिखी, समझदार लड़की है, लेकिन परिस्थियाँ या कहें जीवन की वास्तविकता उसे इस कदर तोड़ देती हैं कि सारी समझ दूर खाई में जा गिरती है ये यात्रा हमारा इंडिया को आपके इंडिया तक ले आती है।

 

लेखक ने इस कहानी के लिए काफी रिसर्च की होगी, तथ्यों और नक्सली जीवन की बारीकियों पर गहराई से काम किया गया है। मनीषा कुलश्रेष्ठ लिखती हैं मृत्यु मृतक को कहाँ एकाकी कर पाती है, एकाकी तो रह जाने वाले होते हैं

 

तीसरी कहानी जो दिल के करीब रही वो है एक ढोलो दूजी मरवण... तीजो कसूमल रंग। दैहिक प्रेम और आत्मिक प्रेम के बीच जैसे खांचा खीच दिया गया हो। इस कहानी को इसके  भाषा-शिल्प के लिए जरूर पढ़ा जाना चाहिएएक हिस्से में बादलों सा भीगता नेह, दूसरे हिस्से मौन में पलता मोह, समाज की बन्दिशें और आँखों की पर्दादारी।

 

मनीषा कुलश्रेष्ठ लिखती हैं इसकी आँख केवल आँख नहीं थी, आँख में एक सूना दिल बैठा था, उकड़ू साथ ही आँखों पर लिखी ये पंक्तियाँ उस पर बहुत बड़ी और घनी बरौनियों वाली आँखें, गली के मुहाने पर उगे दो पीपल। जो उठतीं तो उदास करती हीं, गिरतीं तो रुला ही जातीं, एक तटस्थ और अडिग दुख वहाँ जमा हुआ था।

 

 

ये कहानी भीलवाडा के पास बसे एक छोटे शहर गुलाबपुरा के बस स्टैंड पर शुरू होती हैकहानी के मुख्य किरदार कंडक्टर और एक विधवा लड़की को पता भी नहीं कि बस में सीट पर बैठे दो अन्य किरदार उन्हें अपनी कहानी का हिस्सा बना चुके हैं, सीट पर बैठे कपल का रिश्ता अलगाव की कगार पर है, हम बेजा बातों के लच्छे लपेट रहे थे, जिनका कोई मतलब नहीं बचा था, मन सुन्न था, अलगाव की आगत आहत से। बीतते पर संशय था। मेरे मन का एक हिस्सा उसे तमाम जद्दोजहद से थक हार कर पूरी तरह भूलना चाहता था, और दूसरा हिस्सा भूल जाओ के खयाल मात्र से चीख पड़ता था, जैसे किसी के पके घाव को छू भर लिया हो

 

वहीं दूसरी तरफ एक अनकहा प्रेम, ऐसा महीन धागा जो शारीरिक प्रेम से परे दो रूहों के बीच था, एक दूसरे की फिक्र के बीच पनपती चाह उसे उसके प्रति कोई सहानुभूति या कोई सरोकार लगता था। लेकिन मानो उसके उस दिशा में देखने मात्र से कोई पवित्रता थी जिसके भंग हो जाने का खतरा हो। किसी बहुमूल्य भाव के बहुत सस्ता हो जाने की शंका हो, या संयम ही तो था, उस कंडक्टर का जिसे मैं और शैलेश एक साथ महसूस कर रहे थे लेकिन कुछ समझ नहीं पा रहे थे

 

किरदार की हर कहानी पर लंबी बात की जा सकती है कहानी ठगिनी में लड़कियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाया गया है आज भी गांवों और शहरी परिवेश में लड़की होने पर होंठों के आकार को पढ़ा जा सकता है, इस कहानी में कैसे एक लड़की अपने अतीत को खंगालती बियाबाँ में एक अंजान के पीछे पीछे चल देती है और अंत में जिस दरवाजे जाकर पहुँचती है वो वाकई हमारे पढे-लिखे जागरूक समाज को आईना दिखाने जैसा है।   

इसी तरह एक और कहानी है, समुद्री घोडा’, ये विज्ञान और मेडिकल साईन्स की कई परतें खोलता है, एक पिता के गर्भ धारण करने की घटना कहानी का नायक अपनी पत्नी से कहता है रौद्रा, मुझे पता है, संसार भर से लड़ने से पहले, मेरा पहला युद्ध तुमसे होगा

 

मनीषा कुलश्रेष्ठ ने इस किताब में कई विषयों को छुआ है वहीं एक कहानी जनरेशन गैप पर भी लिखी गई है, कहानी में पिता अपनी बेटी के प्रेम और उसकी दुनिया को समझने में नाकाम है,  बेटी मासूम फुदकता हुआ ख्वाब है जो कि पिता के सुरक्षा घेरे में क्षण क्षण डूब रहा है।

 

पापा अब वह ज़िंदा नहीं है। वह तटस्थ थी। उसके चेहरे पर जमा हुआ दुख दिख रहा था। उसके होंठ काँप रहे थे, आंसू पी लिए थे उसने, लेकिन मैं उसका रुदन सुन सकता था। उसने उसकी समाधि अपने ही भीतर बना कर, पीड़ाओं का, बिना नाम का समाधिलेख लिखकर दरवाजे बंद कर दिए थे खुद के।

 

एक बेटी की नज़र से दुनिया को देखने पर महसूस हुआ कि आधी दुनिया के प्रकाशवान होने के बरक्स आधी दुनिया कर्कश, हिंसक और बीमारियों और वर्ग भेदों से भरी दुनिया भी थी। सारे आदर्शों की बात करते बड़े लोगों की अपनी कमजोरियाँ और भ्रम थे। कुलीनता की रोशनी के अपने साए थे जो गिरते जमीन पर ही थे, विश्वासों की एड़ियों में दरारें थी

 

इस किताब की आखिरी और मजबूत शीर्षक कहानी है किरदारवह कितनी सुंदर, संतुलित, कार्य कुशल महिला थी, उसे एहसास था जिम्मेदारियों का, वह मर नहीं सकती

 

मुख्य किरदार ने आत्महत्या कर ली है, लाख ढूँढने पर भी कोई वजह नज़र नहीं आ रही, सतही रिश्ते में बंधा साथी, कैसे देख पाता जीती जागती लड़की के भीतर सुलगता दुख। 

 

मेरे हिसाब से आपसी प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति भी यथासंभव हम दोनों के बीच रही ही। झगड़ा तो दूर हमारे बीच कभी बहस तक नहीं हुई, असहमतियाँ आपसी समझदारी के निकष पर कस कर सहमतियों में तब्दील होती रहीं।

 

क्या मैं अपनी पत्नी के स्वभाव को कुरेद कर देखने में असफल रहा? क्या यह सतह सतह का रिश्ता था?’

 

इस कहानी को पढ़कर लगता है ये भारतीय समाज के ना जाने कितने घरों की कहानी है, एक लड़की शादी के बाद इतने रिश्तों में ढलती हैं कि उसका अस्तित्व खोजे नहीं मिलता, घुटन हर पल झूठी हंसी में तब्दील हो जाती है, और सपने किसी बिसरे युग में जिसे वो खोने से भी डरती है, कहीं भूले से महसूस कर लिया अपना आप तो रेत के महल सी ढह ना जाए।

 

सपनों की सी दुनिया भी कभी कभी बुरी लगती है क्या? क्या मैं बेवजह खुशी में असंतुष्टि खोजने के महान तर्क खोजती हूँ। पास में नदी होते हुए, तृष्णा की तरफ डग भर रही हूँ? अतितृप्ति की मारी हूँ? तृष्णा के लिए तृषित?’

 

मनीषा कुलश्रेष्ठ का यह कहानी संग्रह किरदार प्राथमिकता के साथ पढ़ा जाना चाहिए, एक श्रेष्ठ कृति।  

 

April 01, 2021

अनुकृति उपाध्याय का उपन्यास 'नीना आंटी': जिजीविषा से भरा किरदार

 


आप एक लेखक की पहली किताब पढ़ते हैं, ज़िंदगी को लेकर उनका नज़रिया आपको अचर में डालता है, भीतर एक इच्छा जन्म लेती है, उस लेखक का लिखा हुआ सारा कुछ एक प्रवाह में पढ़ जाने की, अनुकृति उपाध्याय मेरे लिए वहीं लेखक हैं। उपाध्याय का लेखन नीम वाले आँगन में गमकती दोपहरी सा है, जो सोच के नित नए द्वार खोलता है। मैं जाने कितनी बार उनके लिखे के बीच लौट-लौट जाती हूँ, उनकी किताबें उतनी ही सहृदयता से मुझे अपनाती हैं, मन के भटकाव को जैसे कोई नर्म हथेलियों में थाम भर ले।

इन दिनों राजपल एंड संस से प्रकाशित अनुकृति उपाध्याय का नया उपन्यास, नीना आंटी पढ़ा। नीना जैसा किरदार गढ़ना ही, पुरुषसत्ता के ढांचे को ध्वस्त कर, स्त्री के अस्तित्व के लिए नई संभावनाएं तलाशना है। ये उपन्यास एक लड़की के हिस्से का सच कहता है, सीधा-सपाट सच।

उपन्यास के कथा केंद्र में है नीना, जो किसी दूसरे के गीत में बिंधा महज़ कोरस नहीं बल्कि अपने में सम्पूर्ण सिंफनी है, हर औरत का इतिहास नहीं होता, सिर्फ समझौतों से भरी सकरी गलियाँ होती हैं। नीना का इतिहास था, विद्रोहों और उद्धत्ता, प्रेम और आवेगों से रंगीन इतिहास।

उसने कभी बनी-बनाई लीक पर चलना सीखा ही नहीं, वो मानती है कि मन का करने से पहले मन को जान लेना जरूरी है। बाहरी दुनिया के लिए वो दिखावटी मुखौटा नहीं पहनती, जो भी अनुभव हैं गहरे और बेधड़क जिये हुए, चाहे वो सुंदरता हो या कोई चोट, यह हर स्पर्श को सीधे आत्मा पर महसूस करने जैसा है।

नीना के भीतर मुस्कुराहटों की गुप्त गंगा है, खुले दिल वाली मुस्कुराहट, मन मसोसकर जीना उसने सीखा ही नहीं, अपनी परेशानियों से खुद निपट लेती है, दुख पहुंचता है तो भी ज़ाहिर नहीं करती, कर भी देती तो क्या कोई उसका पक्ष समझ पाता? शिकायत नहीं करती लेकिन बेबाक है, ऐसी उन्मुक्त पाखी रूह को मठाधीशों का रौब भला कहाँ बांध पाएगा? उसे किसी ऐसे शख्स की ज़रूरत नहीं जो उसके लिए दुनिया से लड़े, “सबके बीच अंतराल खोज एकाकी, दल में अलग थलग चुगती गौरैया, एकल, व्यस्त, अपने में पर्याप्त



एक विशाल परिवार का हिस्सा थी नीना, लेकिन किसी ने उसे मौसी या बुआ नहीं नीना आंटी कहकर ही पुकारा, कोई और संबोधन उसके व्यक्तित्व पर जंचता भी कैसे? परिवार के युवा दल के बीच खासी लोकप्रिय रही, सभी उसके पास कभी ना कभी आए, जीवन की उलझन, थका मन, दुखता अहम, कुढ़न, कुंठा लेकर। नीना दार्शनिक स्तर पर जिंदगी को देखती हैं, “जब भी कुछ सुलझाना हो तो धागों को खींचना नहीं चाहिए, हल्के हाथों अलगाना चाहिए।”

अनुकृति उपाध्याय ने नीना आंटी उपन्यास, एक युवा किरदार, सुदीपा के नजरिए से लिखा है, सुदीपा ही इस कथा की नरेटर है, जो इस वक्त बेचैनियों की पोटली बांध नीना आंटी के पास पहाड़ चली आई है। अभी तक जिन्हें अफवाहों में सुना, यहाँ पहाड़ पर पहुँचकर वो उनकी जिंदगी को करीब से महसूसती है, उन्हें बागवानी करते, फूलों से इत्र तैयार करते देखती है। सोचती है कि इस हवेलीनुमा मकान में अकेले रहने को लेकर नीना आंटी का पूरा परिवार क्यूँ उनके खिलाफ है?

किसी एक के भूल जाने या नकारने से तुम्हारी याद झूठी नहीं पड़ जाती, अक्सर हमारी स्मृतियाँ एक दूसरे से मेल नहीं खातीं, जो जैसा तुम्हें याद रहता है, वो वैसा ही दूसरे को नहीं

सुदीपा खंगाल रही है नीना आंटी का स्याह अतीत, नीना ने प्रेम किया कई दफ़े किया, फिर शादी क्यूँ नहीं की? जैसा सब कहते आए हैं क्या सचमुच नीना आंटी एक बुरे चरित्र की औरत थीं? किस्सों में किस्से खुलते हैं, स्मृतियाँ आकार लेती हैं, सोच के स्तर पर कई सवाल खड़े होते हैं।  

इस तरह नीना के बहाने, तीन पीढ़ी की औरतों का सच सामने आता है, नीना की माँ जिनमें इतनी हिम्मत नहीं कि अपनी सोच और फैसले की डोर खुद थाम सके, अपनी बेटी के सही को सही कह सके। अपने आखिरी समय में माँ और नीना के बीच घटे वो कुछ पल, वही सच्चे थे बाकी सारी जिंदगी झूठ? किताब के आखिरी कुछ पृष्ठ आपको सोचने पर मजबूर करते हैं।


समाज की लादी मान्यताओं को ढोती अकेली माँ ही नहीं, नीना की बहनें भी थी। अनुकृति उपाध्याय ने कैसे इन पात्रों के बीच नीना का जिजीविषा से भरा व्यक्तित्व रचा है। वो कहानी का एक सिरा वर्तमान से उठाती हैं और अतीत से जोड़ देती हैं, ये उतार-चढ़ाव सहजता से चलता है। उपाध्याय के उपन्यासों में प्रकृति का विवरण अवश्य होता है, जो उनके पात्रों के चरित्र को निखारता है।

एक बार जाने हुए से फिर अंजान नहीं हुआ जा सकता, जाना हुआ ऐसा जिन्न है जो फिर से बोतल में बंद नहीं किया जा सकता

जिसने उपाध्याय को पहले पढ़ा है वो इनके भाषा शिल्प का प्रसशंक रहा होगा, रंगों में डूबे, सांस लेते बिम्ब, जीवंतता से भरी छवियां, यह प्रकृति को शब्दों के कैनवास पर शिद्दत से जीने जैसा है। शब्द-शिल्प और किस्सागोई में गहरी पकड़ एक अच्छे लेखक होने की पहली शर्त हैं।

नीना आंटी स्त्री चेतना को आधार बनाकर लिखा गया है, जो अपने मुख्य किरदार के बहुआयामी अनुभवों और संवेदनाओं के जरिए सीधे पाठक से संवाद करता है। इसे लघु उपन्यास क्यूँ कहा गया, जबकि ये अपने आप में सम्पूर्ण है, इसे 112 पृष्ठों में ही सिमट जाना था, सिमट गया। उम्मीद कभी लघु-वृहद नहीं होती, अनुकृति उपाध्याय की किताब नीना आंटी सूखते जंगल के बीच वही हरियाती उम्मीद है। हर पाठक वर्ग के लिए एक जरूरी किताब।    



लेखक के बारे में 

अनेक वर्षों तक हाँगकाँग में बैंकिंग और निवेश के सैक्टर में कार्यरत रहने के बाद अनुकृति उपाध्याय ने अपने कहानी संग्रह ‘जापानीसराय’ के जरिए साहित्य-जगत में प्रवेश किया था। द्विभाषी लेखक हैं, वह लिखती हैं इस आशा में कि इस रचनात्मक जोड़ने-तोड़ने में वह कुछ अनाम ढूँढा जा सके जो शायद है भी या नहीं भी। 'नीना आंटी' हिन्दी में उनका पहला उपन्यास है'।  

लिंक: नीना आंटी ऑनलाइन खरीदी जा सकती है। 

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