November 18, 2013

अर्धसत्य..!!


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ये तो रोज़ होता है
रोज़ ही तो होता है...

अखबार के पन्ने पलटते ही
चार पाँच ऐसी खबरें आपका ध्यान पाने की
जद्दोज़हद में जुट जाती हैं

कभी-कभी आक्रोश फफक उठता है
एक सम्पूर्ण पृष्ठ ही क्यों नहीं
“ बलात्कार विशेष “ के रूप में छापते ?
जब भी कभी बड़े काले अक्षर चुनती हैं आँखें
नहीं पढ पाती आगे की मर्माहत दास्तां

आँखें बंद करती हूँ तो
धड़कन थम सी जाती है
सर्द पड़ जाता है अस्तित्व
निर्जीवता बहने लगती है
रक्त की हर बूंद के साथ
कुछ अश्क़ भिगो देते हैं हैं लबों को
डूब जाते हैं कुछ सुबकते अल्फाज़

आज उसने शारीरिक प्रताड़ना झेली होगी
हाँलाकि मानसिक वेदना
कलुषित समाज़ का भद्दापन तो
प्रतिक्षण झेलती है वो

घर से बाहर निकलते ही
उसके ज़िस्म को चीरती हज़ारों नज़रें
बाहर से आते तीखे फिकरे
रौंध डालते हैं रूह उसकी..

किसी बस में सवार हो जाए
तो झपट पड़ते हैं दसियों हाथ उसकी तरफ
क्षत-विक्षत कर देते हैं उसके समूचे विश्वास को..

विश्वास जो उसकी माँ ने दिलाया था
” बेटा, ये दुनिया बेहद खूबसूरत है,
ज़िन्दगी में प्रत्येक क्षण...

हर एक नेमत का बाँहे फैलाकर स्वागत करना “
अधूरे सत्य से अलंकृत आइना
जो दिखलाया था माँ ने टूट गया
अब कदमतर उस टूटे काँच की किरचें
चुभती हैं नित्य नये चेहरे बदल कर

आज फिर से एक ओझल दुनिया जीवित हो उठी
वक्त से कदमताल मिलाकर चलने,
कुछ सीखने की ललक में
अपना मासूम बचपन बिसार दिया उसने,
अपनी ख्वाहिशों को नये पंख देने की
चाहत लिये...
छोड़ आई पीछे माँ के आँचल की नरम धूप

किंतु असुरक्षा का दलदल,
कभी इज़्ज़त की सांकल
उसके सतरंगी सपनों को निगल गये

उसके ज़ेहन में प्रतिध्वनित
दुनिया लांघने की ज़िद सहम गयी
निष्प्राण हो... बेचेहरा हो गयी

ये खामोश क्रन्दन रात भर
उसकी सोयी हुई आत्मचेतना को भिगोता रहा
सुबह तकिया गीला था
शायद अपने वजूद पर उठाये
सारे प्रश्न, सारी शिकायतें
अश्कों के साथ धुल चुके थे...

“ मुझे लड़ना होगा अपने लिए,
अफसोस नहीं फख्र करना होगा
अपने अस्तित्व पर,
अपने समक्ष खड़े समाज को
“समर्थ नारी” की एक नई परिभाषा समझानी होगी...

अपने व्यक्तित्व में नया अध्याय जोड़ने का संकल्प लिये
मजबूत इरादों का लिबास ओढ़
सूर्य की पहली किरण की भांति
दमक उठा उसका यकीन...

सुबह फिर अखबार आएगा,
फिर मीडिया नेताओं के खोखले भाषण प्रसारित करेगी,
फिर वातानुकूलित कक्ष में कानून बनाकर
फाइलों में दफना दिये जाएगें,
रात दिन अंगरक्षकों से घिरे सेलिब्रिटी
एक-आध ट्वीट कर देंगें,
ये मूक समर्थक व कुछ रिवाज़ी औपचारिकताऎं...

और वो नुक्कड़ पर खड़ी चाय की दुकान पर भी
दिन भर चर्चा का विषय रहेंगी यही सुर्खियाँ,
” अज़ी बहुत ही बुरा हुआ..!! “
चाय के कप को लबों से लगाते ही
उन सभ्य सामाजिक प्राणियों के चेहरे पर फैल जायेगी
एक कुटिल मुस्कान...

और फिर कहीं छोटे से आंगन में
अपनी नन्ही कली को बाँहों में समेटे,
किसी माँ की स्नेहमयी आँखें दिखा रही होंगी
एक सजीला स्वप्न...

” बेटा दुनिया बहुत खूबसूरत है “

समाज की बदलती तस्वीर को निरंतर पढ़ती
फिर किसी बेटी कि नज़रें
माँ के समक्ष उस खूबसूरत दुनिया का
नया द्वार खोल रही होंगी

पूरा कर रही होगी एक अर्धसत्य
“ माँ, दुनिया इतनी भी खूबसूरत नही...!! “


  

 - Ankita Chauhan