May 30, 2014

नन्ही-सी उम्मीद !

Photo Courtesy : Google 

बेपरवाह बहती मेरी
ज़िंदगी में,
जब दस्तक दी
उसके नाज़ुक कदमों ने
तो सांसें यकायक
ठहराव पा गयीं...

मेरे व्यक्तित्व का एक सिरा
जैसे रिहा कर रहा हो मुझे
और दूसरे सिरे पर
नवीन रिश्ता बाहें फैलाए
पुकार रहा हो ..

बीच में अटका हुआ सा 
एक प्रश्न
सम्हाल भी पाऊगीं मैं
उस मासूम से एहसास को...!

असहज़ हो मैं
अपलक तक रही थी
मेरे चारों तरफ़ चेहरों पर
गूंजती बेतहाशा खुशी को

और

जब पहली बार
रूई के फ़ाहे सी ज़िंदगी को मैंने
अपने सजल गालों से छुआ,
मेरे अस्तित्व में एक
नई संज्ञा (माँ) का जन्म हुआ...

दरअसल,  
आज मेरे अपनों की
हर इक अर्ज़ी मंज़ूर हुई है,
मेरे सूने चितवन में
एक नन्ही-सी उम्मीद हुई है...!!


- अंकिता चौहान 



नफ़्ज़ में बहते रिश्ते !

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ऐ ज़िन्दगी,
तेरी रहगुज़र में,
दूर तलक
ज़ुल्मत के साये..

कौन है अपना
कौन बेगाना,
इसमें दय़ार गुजरती जाए..

उनकी तल्खियों को 
हम 
कुछ खामोश करें यूं,
के गैरों से खफ़ा हो जाऐं..

क्या कीजे
जब
नफ़्ज़ में बहते रिश्ते ही
बेहिस हो जाऐं..!!


रहगुज़र- रास्ता , ज़ुल्मत- अंधेरा , दय़ार- ज़िंदगी , तल्खियों- कड़वाहट ,
खफ़ा- रूठना , बेहिस- संवेदना शून्य ॥



- अंकिता चौहान 

May 26, 2014

शरारत

Photo Courtesy : Google 

लम्हों की
नज़ाकत को समझो,
लफ़्ज़ों को
हिमाकत करने दो...

छुप-छुप के
चखा करती है मुझे,
उन
पलकों को शरारत करने दो...

शब पड़े  
जो ज़ुल्फों की
गिरहों से उलझते हैं,
वो हमज़बां
सहर होते ही
लहज़े बदलते हैं...

तुम
इक उम्र तक
मुझ में  
ठहर कर ज़ानिब,
इस रिश्ते की हिफाज़त करने दो,

एक ख्वाब, हकीकत करने दो ..!!

- अंकिता चौहान 

May 22, 2014

Book Review : The Accidental Prime Minister: Sanjaya Baru



Title: The Accidental Prime Minister
Author: Sanjay Baru
Publisher: Penguin Books
Genre: Autobiography
Pages: 320
Rating: 5/5

First of all  I do apologize if I ever said/Rted something about Mr. Manmohan Singh because after reading this book of Sanjaya Baru, I’m only left with a word “ Respect “. The image of Manmohan singh which had crushed brutally by media and social activists ( because of wrong reasons )  has revived again,
For me atleast !!

It tells you how an honest man faces obstacles to maintain his dignity, his moral values.. and How he restricted by many illegitimate powers. If Readers could manage to see behind the mirror The picture would be clear, The PM-Manmohan was a person with lack of authority, punished for his goodness in amidst of dirty politics.

Thanks to Sanjaya Baru Sir.It’s a  Worthwhile Read !

Sharing few striking parts of book..
1.      One senior leader told a senior editor, ‘ What does Baru think ? He think doctor sahib ( Dr Singh ) can win us election ? we have to project Rahulji’s image “
…… the PM sat stiff in  stony silence I broke the silence by adding the party wants to give the entire credit for this decision to Rahul but both you and Raghuvansh Prasad deserve as much credit.’
I don’t want any credit for myself he snapped,” after many seconds of deafening silence the PM said “ let them take all the credit. I don’t need it. I am only doing my work. You just write my speeches for me. I don’t want any media projection"

2.      Pranab was never so transparent either in expressing his disagreement or support. After returning from an important visit to Washington D.C , Pranab chose not to brief the PM for three days. He had gone to see Soniya Gandhi but had not sought an appointment with Dr Singh. On the third day I asked Dr singh what had transpired at Pranab’s meetings with president bush. ‘ I don’t know ‘ his plaintive reply .
I was taken aback. How could the foreign minister not have briefed the pm immediately on return?

3.      ‘ I dream of a day when, while retaining our respective national identities, one can have breakfast in America, lunch in Lahore and dinner in Kabul, that is how my forefathers lived. That is how I want my grandchildren to live’ – Manmohan singh, FICCI annual genral meeting 2007.

4.      Within a few minutes I was summoned by the PM. When I met him at home, he looked unusually relaxed, clearly the burden was now off his shoulders. Yes, he told me, he had spoken to Sonia the previous day and told her that his position had become untenable. He also explained what had led to his offer to resign. The Indian side had been all set to go to the IAEA to negotiate an Indian-specific safeguards agreement but the left wanted the draft agreement to be shown to them before they authorized the government to go to the international body. This was impossible, said the PM.  As a secret document, the draft agreement could not be shown to those not in government until the negotiations with the IAEA has ended. Moreover, India would be placed in an embarrassing position if, at this stage, the government chose to stay away from IAEA, on account of the left’s arm twisting.

It was clear to him that the left would never support the government. The choice before the government was, in his mind, obvious: ignore the left and proceed, and agree with the left and stay put. Explaining this to Sonia Gandhi, the PM had then told her that if the UPA chose the second option, it would have to find another prime minister to lead the coalition. Sonia requested Dr singh to sleep on this issue. When she realized he was serious, she summoned Pranab mukherjee.

5.     Several weeks later, after I joined business standard, I was invited for a function at 7 RCR. We talked about many things finally he turned to the subject weighing in both our minds.
He said, ‘ I am sorry about what happened. You see, you must understand one thing. I have come to terms with this. There cannot be two centres of power. That creates confusion. I have to accept that the party president is the centre of power. The government is answerable to the party.’
I saw no point in disagreeing with him or contesting his thesis. But of course, I did disagree with it.  The prime minister was answerable to the parliament and the government was governed by the constitution. The party president was only the leader of the party. The PM is the leader of the country as a whole and head of the government.
Each one of us finds our own rationale for what we do and do not do. He has found his.

6.      He was charged not with the corruption, but with turning a blind eye to the corruption of others.

7.      There are questions that will probably haunt Dr Singh too, most of all, why did he not quit when he has realized he had lost all the vestiges of control over his own government ?

About the Author

Sanjaya Baru was chief editor of the Financial Express and Business Standard. He is currently director for geo-economics and strategy at the International Institute of Strategic Studies.



 P.s – A special thanks to that person who actually bought this book and allowed me to read.

लफ़्ज़

Photo Courtesy : Google 


एक शख़्स
गुज़र-सा रहा है,
उन लफ़्ज़ों की तलाश में..

लफ़्ज़
जो बयान कर सके
उसके तस्सवुर को,

लफ़्ज़
जो हिफाज़त कर सके
इस दौर-ए-सादगी की,

लफ़्ज़
जो पहरन दें
उसकी आंखों में पलती
गुफ़्तगू को,

लफ़्ज़
जो उसे दिलों पर
हुकुमत करने का
सलीका दें....!!  


- अंकिता चौहान 

May 08, 2014

Book Review : प्रेरक प्रसंग - राष्ट्रबन्धु



जब भी हम भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हैं तो अतीत पीछे छूटता जाता है, यह गलतफहमी है हमारी । वरन हमारा अतीत और उससे जुड़े पात्र हमारे वर्तमान की परछाई बन साथ साथ चलते हैं, हमारा मार्गदर्शन करते हैं ।
गत दिनों राष्ट्रबन्धु जी की किताब प्रेरक प्रसंग पढ़ने का अवसर मिला । साधारण सी दिखने वाली ये किताब अपने राष्ट्र के लिए जीने वालों का आकलन बहुत ही सरलता से करती है । कई दिग्गज़ों के जीवन-वृतांत से लिए गये कुछ महत्व्पूर्ण प्रसंग इस किताब में बांधे गये हैं
जो मुझे भारतीय होने पर गर्व करने क एक और सबब देते हैं !!
मसलन . . .

रामानंद चटर्जी इन्होनें अंग्रेजी माध्यम की ब्रेल लिपि को बदलकर बँगला भाषा के उभरे अक्षर तैयार कराए और दृष्टिहीन व्यक्तियों की पढ़ाई के लिए उपकरण जुटाए । बड़े बाबू (प्रख्यात नाम) ने कई जगह पर प्रेस और कार्यालय स्तापित किए, ये पुस्तक प्रकाशक भी थे । दासी, प्रवासी, प्रदीप और् मोर्डन रिव्यु (अंग्रेज़ी) जैसी कई पत्रिकाओं का संपादन किया । स्लाटर ऑफ द इन्नोसेंट्स लेख लिखकर छात्राओं को अवांछित परिक्षाओं से छुटकारा दिलाया । रविन्द्रनाथ टैगोर के साहित्य को विश्व स्तर पर पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था ।

प्रेमचन्द्र  देश की स्वतंत्रता के लिए प्रेमचन्द्र जी ने लिए लेखन किया । इन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों में किसानों और मजदूरों की परिस्थितियों और समस्याओं का चित्रण किया । गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलनको स्वीकार किया । प्रेमचन्द्र जी उर्दू पत्र आवाज़े खल्कमें नवाबरायनाम से लिखा व सोज़ेवतनमें पाँच कहानियाँ लिखी, जिनमें स्वतत्रता का आवाहन था । इन आग्नेय कहानियों का प्रभाव इतना था कि धनपतरायलेखकीय नाम प्रेमचन्द्र को अपनी सरकारी नौकरी (डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल) भी छोड़नी पड़ी ।

इसके अतिरिक्त..

निराला जिनकी कविताओं को कुछ शास्त्रियों ने रबड़ छंदकहके उपहास उड़ाया ।
जूही की कली”,  “वह तोड़ती पत्थरजैसी कई श्रेष्ठ रचनाऐं लिखीं ।
मीराबाई जिनके पदों ने संगीत प्रधानता को वरीयता दी । इनमें घोर निराशा से आशा के आयाम मिलते हैं ।


जगदीश चन्द्र बसु (जीवधारियों व वनस्पतियों में साम्य) , डॉ. होमी जहाँगीर भाभा (कॉस्केड सिद्धांत) , डॉ. गोविंद खुराना ( इन्होनें औषधि और शरीर-क्रिया विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान देकर नोबल पुरस्कार 1962 प्राप्त किया ) , लोक प्रसिद्ध राट्रपति डॉ, राजेन्द्र प्रसाद , उधम सिंह ( जिन्होंने जलियाँवाला बाग नरसंहार का बदला जनरल डायर पर गोलियाँ चलाकर लिया ) व तुलसीदास जैसे विद्वानों से सम्बन्धित प्रेरणादायक किस्से दिये गए हैं ।                    

May 06, 2014

नानी माँ !

Photo  Courtesy : Google


रसोई के एक कोने पर
शान से टंगी
किसी सुरीले वाद्य यंत्र-सी
वो पीतल की कड़ाई
जिसमें नानी माँ प्रतिदिन
अपने शौक पकाया करतीं...

फिर संध्या समय,
आंगन में खड़े नीम की
शीतल छाया में बैठ,
उस स्याह पड़ चुकी कड़ाई को
घंटे भर तक मांजा करतीं...

तब, उनके मासूम और निश्छल चेहरे में
सुहानी ब्यार सी प्रसन्नता, 
होंठों पर कई धुनों की तल्लीनता होती
औ’ आंखों पर पड़ा होता,
हया से लबरेज़
एक महीन सा घूंघट...

पूछा था मैंने इक बार
ये रोज़ रोज़ की जद्दो जहद क्यूँ ?
उनके धुन सजे लबों पर
मुस्कान तैर गयी...

अब जब भी उनकी यादें
मेरे अवचेतन मन की सतहों में गूंजती हैं,
उनके व्यक्तित्व का
एक नया ही पहलू प्रस्तुत करती हैं,

कि कैसे
नानी माँ कुछ क्षणों के लिए
अपनी व्यस्त्तता से अनभिज्ञ हो,
खुद को करीब से जिया करती थी...

शायद
एक और मीरा
कुछ क्षणों के लिए  
अपने लौकिक जीवन पर विराम लगा
उस पीतल की कड़ाई की आड़ में,
अपने अंतस में बसे कान्हा की
निर्मल स्तुति किया करती थी !!



- अंकिता चौहान