June 27, 2015

पापा



6 मई को मधुरिमा(दैनिक भास्कर) के मातृत्व विशेषांक में एक छोटी सी कहानी या कहिए संस्मरण प्रकाशित हुआ। बेहद खुशी हुई, जिसकी अपेक्षा ना की हो, उसका मिल जाना जादू सा लगता है ना।
दो दिन पहले दैनिक भास्कर की तरफ से एक लिफाफा आया, एक cheque था। हैरान थी मैं और थोड़ा-सा खुश भी, लिखने के पैसे मिलते हैं?

मधुरिमा ने अपने अमूल्य पृष्ठों के बीच मेरे शब्दों को स्थान दिया, ये अपने आप मे किसी उपहार से कम नहीं था मेरे लिए। पापा खुश थे मुझसे कई ज्यादा खुश। शाबाशकहा उन्होंने, ज्यादा बोलते नहीं हैं वो, मेरे नॉव्लस पढ़ने को या कुछ लिखने को वो सिर्फ शौक की तरह ही देखते हैं, लाइक अ टाइमपास।

ऐसे ही खूब लिखा करो, और इस cheque एक शॉट (Photo) ले लो
रहने दो पापा, छोटू सा amount है, कभी कुछ बड़ा मिला तो पक्का लूंगीऔर टाल दिया मैंने पापा की बात को।
पापा फिर उस लिफाफे को देखने लगे, मुझे नहीं पता क्या ढ़ूंढ रहे थे वो उस कागज़ के टुकड़े में। दैनिक भास्कर लिखा था और घर क पता, Ankita Chauhan, D/O ******* ***** Chauhan

शाम को घर आये तो वही लिफ़ाफा थमाते हुए बोले-
वो cheque तो मैंने जमा करवा दिया, लिफाफे में उसकी एक फॉटोकॉपी है, इसको संभाल के रखना, पहला है

शायद सभी पापा ऐसे ही होते होंगे ना, ज़िदंगी की जिन नेमतों को, छोटी छोटी खुशियों को हम बच्चे, नादानी में अनदेखा कर जाते है, हमारे पेरेंट्स उन्हें सहेज़ लेते हैं, उनके लिए हमारी वही छोटी-छोटी खुशियाँ किसी सफलता से कम नहीं होंती। हमारे बड़ों  का यही सकारात्मक रवैया और आशीर्वाद हमें एक हद से पार जाकर जीने का हौसला देता है।

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