March 20, 2014

तब याद करोगे


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दिन किसी अनचाहे मेहमान की तरह
जाने का नाम ही नहीं ले रहा,
टिक कर बैठ गया...

रात भी ना जाने किस
ट्राफिक जाम में फस गयी,
या इसने भी
ना आने के कई बहाने तलाश लिये...

और मध्यकड़ी बनी ये साँझ
स्मृतियों के आगे प्रश्नचिन्ह सा लगा रही हैं...

जैसे रेत पर उंगली से लिखा
इक खूबसूरत नाम मिट रहा हो
धीरे-धीरे...

जैसे समंदर की बेफिक्र लहरें
मेरी सांसों में उलझे इक शख्स को  
बहा ले जा रही हों, अपने साथ

ऐसी ही एक बुझती शाम,
अदा से कहा था तुमने-

“ नही रहूगीं ना, तब याद करोगे “

तुम्हे गया अरसा हुआ,
नामालुम क्यूँ !
उन लफ्ज़ों के दंश
आज भी आँखें सुर्ख कर जाते हैं...

हर रिश्ता दिल से निभाना आदत थी ना तुम्हारी,
बादस्तूर, अपना हर शब्द निभा जाना  
. . . क्या इतना जरूरी था !!


- अंकिता चौहान


March 16, 2014

पंखुड़ियाँ – 2

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1.

इन आयतों में अक्सर तेरा अक्स ढूंढ़ते हैं,
सुन, इश्क़ की स्याही से इक रब्त फेर दे तू ॥


2.
आइने को भी मुझसे रश्क सा हो जाता है,
तेरी आंखों में जब मेरी तस्वीर बोलती है ॥


3.
दिल में एक हलचल सी मचा जाता है,
तेरा यूँ खामोशी से मुझे पढ़ते जाना ॥


4.
मुस्कुरा कर हमनें पूछा जब
उनकी खामोशी का सबब,
मेरी आंखों में एक अरसे से थमी
नमी देख वो मुस्कुरा दिये ॥


5.
संभल कर चलना तो मोहब्बत का दस्तूर नहीं,
पल पल सुलग सके तो इश्क़ से इश्क़ कर ॥


- अंकिता चौहान 

अवशेष


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कुछ अटक रहा था सीने में
बड़ी देर से,
परखा, समझा, ज़ाना...

कुछ एक हौंसलें जमा किये थे बचपन में
ज़िन्हे वक़्त राख कर गया था
अब टूटे सपनों के अवशेष
सांसो में उलझ
मेरी ज़िन्दगी की मियाद घटा रहे हैं ..!! 


- अंकिता चौहान 

पंखुड़ियाँ

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1.
अपने साथ ले जाती है रूह भी जीवन की माँ,
एक जिस्म बचता है खाली खाली सा...
और इक दिल भरा भरा ॥


2.
एहसास के ताने-बाने से हम छोटी सी ज़िन्दगी बुनते हैं,
कुछ रिश्ते हमें, कुछ रिशतों को हम चुनते हैं ॥


3.
ज़िंदगी भर परखते रहे मुझे मेरे चाहने वाले,
दिल-ए-नादां ने वो सब सहा जो कभी सोचा न था ॥


4.
ये बेफिक्र सी सुबह, गुनगुनाहट शामों की...
ज़िन्दगी खूबसूरत है, गर आदत हो मुस्कुराने की ॥


5.
अपनी हज़ार ख्वाहिशों की कुर्बानी दे,
तेरी हर इक चाहत को पहरन देती है.
माँ तो ऐसी ही होती है ॥


- अंकिता चौहान 

March 10, 2014

अक्सर !

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तितली से परों-सी
नज़ाकत लिये
तुम्हारे अल्फाज़ जब भी
मेरे ख्वाबों की मुंडेरों पर
दस्तक देते हैं,

समेट लेती हूं
कुछ आधे अधूरे संवाद,
कुछ वक़्त की धुंध में
बिसरी झलकियाँ,
कुछ तुम्हारी आवाज़ में
गूंजते नगमें,
कभी एक आलिंगन ...

फिर सुबह-सुबह स्याह पलकों पर
जब बिछने लगती है,
धूप की इक सुनहरी चादर 

. . .मेरी मुठ्ठी बंद मिलती है अक्सर !!


- अंकिता चौहान