March 16, 2014
पंखुड़ियाँ
![]() | |
| Photo Courtesy - Google |
1.
अपने साथ ले जाती है
रूह भी जीवन की माँ,
एक जिस्म बचता है
खाली खाली सा...
और इक दिल भरा भरा ॥
2.
एहसास के ताने-बाने
से हम छोटी सी ज़िन्दगी बुनते हैं,
कुछ रिश्ते हमें,
कुछ रिशतों को हम चुनते हैं ॥
3.
ज़िंदगी भर परखते रहे
मुझे मेरे चाहने वाले,
दिल-ए-नादां ने वो
सब सहा जो कभी सोचा न था ॥
4.
ये बेफिक्र सी सुबह,
गुनगुनाहट शामों की...
ज़िन्दगी खूबसूरत है,
गर आदत हो मुस्कुराने की ॥
5.
अपनी हज़ार ख्वाहिशों
की कुर्बानी दे,
तेरी हर इक चाहत को
पहरन देती है.
माँ तो ऐसी ही होती है
॥
- अंकिता चौहान
March 10, 2014
अक्सर !
![]() |
| Photo Courtesy - Google |
तितली से परों-सी
नज़ाकत लिये
तुम्हारे अल्फाज़ जब
भी
मेरे ख्वाबों की
मुंडेरों पर
दस्तक देते हैं,
समेट लेती हूं
कुछ आधे अधूरे संवाद,
कुछ वक़्त की धुंध
में
बिसरी झलकियाँ,
कुछ तुम्हारी आवाज़
में
गूंजते नगमें,
कभी एक आलिंगन ...
फिर सुबह-सुबह स्याह
पलकों पर
जब बिछने लगती है,
धूप की इक सुनहरी
चादर
. . .मेरी मुठ्ठी बंद
मिलती है अक्सर !!
- अंकिता चौहान
February 21, 2014
परिचय
![]() |
| Photo Courtesy - Google |
पहली बारिश में भीगी
मिट्टी से
उठती सौंधी खुशबू
...
तो कभी, हथेली पर
बेफिक्र महकती हिना मैं ॥
ख़ामोश तस्वीर के
बोलते रंग ...
तो कभी, नज़्म बन
कागज़ पर बहता एक लहज़ा मैं ॥
यादों का अब्र बन
सांसों में सिमटती इक साँझ ...
तो कभी, चाँद के नूर
को मुकम्मल करती इक शब मैं ॥
सब्र को उम्मीदों में
बदलता एक संवाद ...
तो कभी, झूठ को उम्र
भर जीता एक सत्य मैं ॥
एक मुस्कुराहट माँ
के होंठो की ...
तो कभी, बाबा के
माथे की सिलवटों में
छिपी एक फिक्र मैं ॥
वसंत में गूंजती
कान्हा की बंसी ...
तो कभी, पतझड़ में
राधा के नैनों से
बहता इंतज़ार मैं ॥
तेरे थिरकते लबों पर
अठखेलियाँ करती
एक मीठी सी चुप ...
तो कभी, तेरे
अंतर्मन के साथ आँख-मिचोली खेलती
निस्वार्थ प्रेम की
ज़ुबान मैं ॥
February 19, 2014
तारीखें !!
![]() |
| Photo Courtesy - Google |
पुराने साल का
कैलेंडर निकाल
नये के पीछे टांग
लिया,
इस तरह उलझी ज़िन्दगी
से
थोड़ा और वक़्त उधार लिया
।
नये कैलेंडर में
फिर समा गए
प्यार भरा आगाज़ तकते
कई टूटे बिखरे रिशते,
कुछ जलमग्न नैन
पंखुड़ियाँ
और कुछ गिले शिकवे ।
नये कैलेंडर में
जड़ दी गयीं फिर कुछ
तारीखें
इसका जन्मदिन उसकी
सालगिरह,
डॉक्टर अपॉइटंमेंट
एक कोर्ट ज़िरह |
नये कैलेंडर में
छेड़े गए फिर छुट्टियों
भरे सुरीले तार
होली दिपावली जैसे,
निरंतर अपना महत्व
खोते
कई खुशरंग त्योहार ।
तभी कुछ तारीखें
यादों के दायरे तोड़ झलक
पड़ी आंखों से
और चढ़ा गई लबों
पर...
खामोशी भरी मखमली
शॉल ।
वो इक
भीगा हुआ दिन तुझ
संग मसरुफियत का,
वो इक
भीगी हुइ शाम तुझसे
अज़नबियत की !!
- Ankita Chauhan
January 03, 2014
शायद !!
उसके चेहरे पर महकती
है जब मुस्कान की इक सुबह,
उसको सवाँरते ग़ुज़र
जाती हैं ना जाने मेरी कितनी शामें...
3 Sep 2013
आज अपनी ज़िन्दगी के
एक नये अध्याय को,
दुनिया की इक नयी
भाषा को
पढ़ने की जद्दोज़हद
में लगा हुआ है वह
कॉलेज का पहला दिन
है ॥
12 Oct 2013
सुबह से उसके मोबाइल
में
तैर रहा है पहला नशा
और भी कई प्यार भरे लम्हातों
की
संज़ीदगी ओढ़े कुछ
सुरीली धुनें...
आज खुश है वो,
एक चहकते पंछी की
तरह
आस्मां के क्षितिज
से परे,समय से परे
उड़ जाना चाहता हो
जैसे
उसकी खुशी मेरे
होठों पर छलक रही है
मैं भी आज खुश हूँ ॥
2 Nov 2013
आज सुबह से दिख नहीं
रहा
बिनकहे ना जाने कहाँ
निकल गया !
हमेशा बता के जाये,
इतना छोटा भी तो
नहीं रहा,
शायद बड़ा हो गया वो
आज
और मैं नाहक ही
परेशान ॥
18 Dec 2013
सुबह के चार बजे हैं
और अभी तक साहबज़ादे
के कमरे की
लाईट-ऑन है, य़े
बच्चा भी ना..!!
कितना इररेस्पोनसिबल
हो गया है,
कहता है “ माँ
असाईनमेंटस “।
नज़दीक पहुँचने पर
पता लगा
वो कुछ गुनगुना रहा
है,
विडियो कॉलिंग पर है
“ग़ुड मॉर्निग बेबी”
जैसे कई राग अलाप
रहा है...
मुस्कुराते हुए किचन
तक
और किचन से डॉइनिंग
टेबल तक पहुँची
तब तक साढ़े आठ बज
चुके थे,
नया हेयर्-कट लिए
अपने कॉलेज-बैग के साथ
भागता हुआ
आया,सैंड्विच उठाया,मोबिइल पर नज़रें गढ़ाए
किसी अज़नबी झोंके की
तरह निकल गया वह...
नियमितता की पटरी से
उतर गयीं मेरी कुछ धड़कनें
कुछ ठहर गई मैं !
आँखों में आई नमी को
एक हल्की मुस्कान की
तरफ ढकेला,
शायद जल्दी में होगा
वरना
”अच्छा ! माँ मिलते
हैं शाम में” कह
अपनी भोली सी
मुस्कान बिखेर
मिटा दिया करता था
मेरी सारी थकान,
मैं फिर देने लगी
खुद को
“शायद” लफ्ज़ के साथ
गढ़ी कुछ तस्सलियाँ ॥
23 Jan 2014
शाम को क़ॉलेज़ से
कंधे पर लदे बैग के साथ
उदासी भी टांग लाया
चहरे पर,
”खाना खा के आया
हूँ” कहकर
विडियो-गेम्स में
उलझ गया, कुछ पलों में लाइट-ऑफ
दस ही तो बजे थे अभी
!
इतनी तेज़ ठंड और
“शायद” एक्स्ट्रा-क़्लासेज़ !!
24 Jan 2014
अधखुली आँखों से
देखा,
घड़ी पाँच की ओर
इशारा करने लगी,
उसके रूम की लाइट जल
चुकी थी..
बालों को समेटते हुए
अनचाहे ही लबों पर मुस्कान तैर गई
और धीमा सा स्वर
“नौटंकी”
कमरे में झांका तो
वो मासुमियत का
कम्बल ओढ़
करवट दर करवट कुछ
यादों की स्लाइड्स बदल रहा था
कभी खुद से लड़ रहा
था,
कभी तकिया गीला कर
रहा था...
मेरे होंठों की मुस्कान
को कर रफा दफा,
वह स्थान कुछ प्रश्नों
ने लिया..
मुझे देखते ही वह
लिपट गया मुझसे
उसकी आँखें बोल रही
थी जैसे
आज ज़िन्दगी जीने का
एक और सबक सीख गया हो...
गोद में लेटे लेटे
ही सीलिंग को निहारते हुए
भारी पलकों के साथ वह
सो गया
शायद सारी रात रोया
होगा,
चेहरे पर एक अमिट
खामोशी बिखरी थी
शायद कोई कीमती
रिशता खोया होगा...
9 का अलार्म भी आज
उसकी नींद में
खलबली मचाने में
असमर्थ रहा,
हल्की नर्म धूप निकल
रही थी कोहरा छँट सा गया,
वह मेरी गोद में कुछ
और सिमट सा गया,
मानो सदियों बाद
बेटा घर लौटा हो !
मुझे तो खुश होना
था, ना जाने क्यूँ
आज मैं
भी उदास हूँ,
शायद इसलिये कि “
मैं एक माँ हूँ ..!! ”
PS - Dedicated to all lovely Mothers & their Selfless love.
December 09, 2013
ऐसे जियो ..!!
![]() |
| Photo Courtesy - Google |
रात की सुराही ने कल
फिर कई ख्वाब बिखेरे थे
कुछ मुकम्मल हो धड़क उठे
कुछ जन्मे ही अधूरे थे...
एक ख्वाब, ठिठके
बगैर
बेसबब लिपट गया तकिये से मेरे
कई हर्फ लबों पर लिए
नज़रों से ताकीदें गढ़ता वो ख्वाब
कुछ खामोशी,
कुछ मदहोशी में करवटें लेता वो ख्वाब...
मैनें गिरा दिया परदा जब दो दियों का
तो,
निगाहों में समेट मेरी झलक
उड़ चला
जीवन की रंज़िशों से दूर, बहुत दूर...
नगमें बह रहे थे
उस मुहब्बत से लबरेज़ अब्र पर
किताबों को हम नहीं, किताबें
हमें
लफ्ज़ दर लफ्ज़ पढ़ने के लिए बेकरार थीं...
कहीं,
बेझिझक सांस लेते
अल्हड़ चंचल रिश्ते खिल रहे थे
कहीं हिज़्र और विसाल आँख-मिचौली खेल
स्नेह शब्द का स्वाद चख रहे थे...
कुछ लम्हें हाथ थामे बिना मंज़िल
तय किए. . .बस चले जा रहे थे
वहाँ ज़िन्दगी की पगडंडी पर
गुनगुना रहा था साज़-ए-अहसास...
सांसों की बाँसुरियों में बह रहे थे
ना जाने कितनी ही गज़लों के मिसरे
और उन सुरमयी सरगमों पर
थिरक रही थीं, छोटी
छोटी खुशियाँ...
एक सिलसिला चाहती थी मैं
उस ख्वाब और मेरे दिल की सर्द फिज़ा के मध्य
तभी किरणों की गुनगुनी आहट ने
मुंदी अँखियों पर दस्तक दी…
फिर खामोशी में खो गया वो ख्वाब
वास्तविकता की धूप में सिफर हो गया मेरा ख्वाब
उस सुबह मेरे कमरे की खिड़की से झाँकते
जड़वत दरख्तों के असीमित इंतज़ार को महसूस किया
मैंने पहली दफा. . .
जो कि कानों में अनवरत एक ही जीवनराग घोल रहे थे
“ ऐसे
जियो कि खुद से पार चले जाओ ....!!”
- अंकिता चौहान
रात की सुराही ने कल
फिर कई ख्वाब बिखेरे थे
कुछ मुकम्मल हो धड़क उठे
कुछ जन्मे ही अधूरे थे...
एक ख्वाब, ठिठके
बगैर
बेसबब लिपट गया तकिये से मेरे
कई हर्फ लबों पर लिए
नज़रों से ताकीदें गढ़ता वो ख्वाब
कुछ खामोशी,
कुछ मदहोशी में करवटें लेता वो ख्वाब...
तो,
निगाहों में समेट मेरी झलक
उड़ चला
जीवन की रंज़िशों से दूर, बहुत दूर...
नगमें बह रहे थे
उस मुहब्बत से लबरेज़ अब्र पर
किताबों को हम नहीं, किताबें
हमें
लफ्ज़ दर लफ्ज़ पढ़ने के लिए बेकरार थीं...
कहीं,
बेझिझक सांस लेते
अल्हड़ चंचल रिश्ते खिल रहे थे
कहीं हिज़्र और विसाल आँख-मिचौली खेल
स्नेह शब्द का स्वाद चख रहे थे...
कुछ लम्हें हाथ थामे बिना मंज़िल
तय किए. . .बस चले जा रहे थे
वहाँ ज़िन्दगी की पगडंडी पर
गुनगुना रहा था साज़-ए-अहसास...
ना जाने कितनी ही गज़लों के मिसरे
और उन सुरमयी सरगमों पर
थिरक रही थीं, छोटी
छोटी खुशियाँ...
एक सिलसिला चाहती थी मैं
उस ख्वाब और मेरे दिल की सर्द फिज़ा के मध्य
तभी किरणों की गुनगुनी आहट ने
मुंदी अँखियों पर दस्तक दी…
फिर खामोशी में खो गया वो ख्वाब
वास्तविकता की धूप में सिफर हो गया मेरा ख्वाब
उस सुबह मेरे कमरे की खिड़की से झाँकते
जड़वत दरख्तों के असीमित इंतज़ार को महसूस किया
मैंने पहली दफा. . .
जो कि कानों में अनवरत एक ही जीवनराग घोल रहे थे
“ ऐसे
जियो कि खुद से पार चले जाओ ....!!”
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