March 29, 2014

अंतिम अभिनय !

Photo Courtesy - Google

“ पर मैंने तो तुम्हें,
तुम्हारे कहे हर शब्द को 
अक्षरशः सच मानकर जिया था,
क्या वो सब बेमानी था ? “

“ कहने के लिए मेरे पास
कुछ है नहीं और सुनना इतना ही
ज़रूरी है तो सुनो
मुझे प्यार नहीं है तुमसे..! “

उसकी आंखों में,
एक चुभता हुआ इंतज़ार छोड़
अपनी राह लौट आया मैं..
जैसे-जैसे मैं
मकान की सीढ़ीयाँ चढ़ रहा था,
कुछ पिघल रहा था सीने में..

जो दिल बर्फ हो चुका था उसके सामने
आंखों का रास्ता इख्तियार कर बहने लगा ।
सांसों ने जैसे मना कर दिया हो
मेरे साथ आने से,
रह् गयीं हो उसी के पास..

अपने ही हाथों खुद को कत्ल कर आया था आज,
ज़रूरी था !
कैसे समेट पाता सम्पूर्ण ज़ीवन को चंद पलों में,
चंद पलों में ही तो
गुज़र जाते है ना छः हफ्ते !
तीन दिनों से गूंजते डॉक्टर के शब्द अब ठहर गए..

खुद को हार आया मैं आज,
जो जीत चुका है, वो है...
मेरा रिश्ता,
इस ज़िंदगी को समर्पित

. . मेरा अंतिम अभिनय !!  


- अंकिता चौहान