March 22, 2015
Dear Shelly : A Short Story
February 15, 2015
गुलजार साब की नज़्म - सब कुछ वैसे ही चलता है
“जो गुजर जाती है बस उसपे गुज़र करते हैं" ज़िंदगी की दास्तां बयाँ करते गुलजार साब के लफ्ज़ हमारे एहसासों को आवाज़ दे जाते हैं। अक्सर उनकी नज़्मों और गीतों में उलझ कर मायने मिल जाते हैं सांसों को, अर्थ मिल जाता है जीवन का..
कैसे कोई इतने आसान लफ्ज़ों में अनकही
यादें पिरो देता है, क्यूँ हम अपनी ज़िदंंगी में घटा हुआ, उनके गीतों में ढ्ंढू लेते हैं, शायद यही गुलजार हैं..
गुलजार साब की नज़्म "सब कुछ वैसे ही
चलता है" धीमे से कामों में एक कड़वा सच गुनगुना जाती है कि ज़िंदगी एक रवायत
है, जिसे निभाना पड़ता है, उनके बिना भी जो कभी आपकी ज़िंदगी थे।
सब कुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था जब तुम थी
रात भी वैसे ही
सर मूंदे आती है
दिन भी वैसे ही
आँखें मलता जागता है
तारे सारी रात जम्हाईयाँ लेते हैं
सब कुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था
जब तुम थी
काश तुम्हारे जाने पर
कुछ फर्क तो पड़ता जीने में
प्यास ना लगती पानी की
या नाखून बढना बंद हो जाते
बाल हवा में ना उड़ते
या धुंआ निकलता सांसों से
सब कुछ वैसे ही चलता है
बस इतना फर्क पड़ा है मेरी रातों में
नींद नहीं आती तो
अब सोने के लिए
एक नींद की गोली
रोज़ निगलनी पड़ती है
- गुलजार साब
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कविता-संग्रह
January 30, 2015
Two Drifting Souls
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| Photo Credit : Google |
I observe you in moments.
Messy hair on your forehead, veils creases.
Half smile with perplexing eyes
As just-born-kid dreamt at mid night
In the shadow of beaming night lamp
I can write you within pages and more pages.
I can make you stay in four by four white chambers and put a
stamp.
But..
Is it okay to trap your identity and embellish reins?
Is it okay to alphabetize you among thin lines?
While I know how does one feels with transected wings.
Would anybody desire to circle up just in one theme?
Would anybody desire
to remain wrapped just in one routine?
Let’s take a fair chance
And surprise each other as dripping trance.
I started enjoying silence since I got you whole?
No limitations. No
criteria.
Just two drifting souls!
Ankita Chauhan
Her Oasis : A Short Story
OFS Frame 17 : If someone would have lost his memories or emotional presence at some point in life, her soul mate is just creating like situations, they have lived before. And trying to get her back.
January 26, 2015
Alvida 2014
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| Photo Credit : Arushi Calender |
Although It could have written at the end of the year. But how could you write something without missing
someone, so yes I am missing you Dear 2014, you have added some beautiful,
sweet-and-salty moments to my life.
Guzar chala ye saal bhi,
yun laga mano
hawa ke jhonke mein lipta ek lamha
aahista se,
mujhe chookar nikla ho abhi abhi..
Kuch khatte meethe shikwe,
Kahin Sukoo’n bhari yaadein,
Kuch ek jhoote vaado’n
mein simta vo ek lamha..
anubhav ki gathri
(sack) bhari kar gaya ho..
umra mein kuch jod, Kuch ghata kar
zindagi ke ankganit uljha kar
ek masoom si rivayat nibha
Guzar chala ye saal bhi..
- Ankita Chauhan
December 26, 2014
Kuch Ishq
आहिस्ता-आहिस्ता,
अब-जब वक़्त बिछड़ने लगा है हथेली से
कुछ आहट महसूस होती है इर्द-गिर्द
डबडबाती पलकें उठाकर देखती हूँ तो
खुद की सांसे ही तैरती मिलती हैं
कुछ बदहवास तो कुछ लावारिस
अनजाने में खामोशी के कुछ
बीज बो दिए थे हमनें,
दिल तक पहुँचती हर राह पर
ना जाने कब,
शिकवों की बर्फ-सी जम गई
इक युग बीत चला,
दो रूहें अर्ज़ी लगाए हुए हैं बरसों से
मानों आखें भी आज़ाद होना चाहती हों
उक्ता गई हों एक बेहिस नज़रिये से
आज सामने पाकर तुम्हें
झिझक की कैद से
चुरा लिया मैंने
एक लम्हा
अधरों पर बिखर गया
गीली हंसी में डूबा इक सवाल,
“इतने अरसे बाद मिले हैं हम
कुछ इश्क़ तो जी रहा होगा तुझमें भी,
कुछ मुहब्बत तो तुझमें अब भी धड़कती होगी..!”
- अंकिता चौहान
December 25, 2014
OFS LIFE : One Frame Million Stories
Sometimes you add something, someone in your routine just for
fun and they become an important part of your life. and You wonder how it happened.
But that’s the beauty of life. Today I’m Sharing ‘My OFS
Life’ with you. Cause it means a lot to me.
Let’s celebrate a ride!
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| One Frame Stories |
OFS Frame 6 : It was amazing to see a world from a bird, crow’s point of view! It is old Performa of OFS, still seems charming.
OFS Frame 7 : When I was weaving this, literally there were tears in my
eyes. Many kids in the world are not as blessed as we are. Respect what you
have!
![]() |
| OFS 11 |
And Journey Continues!
December 16, 2014
Book Review : Mann Mirza Tan Sahiba - Amrita Pritam
अमृता प्रीतम जी ने अपनी इस किताब “मन मिर्ज़ा तन
साहिबा” को पूर्णतः रजनीश जी को समर्पित किया है।
उनके लफ्ज़ कभी ख्यालों के पैरों में पायल से बजते
हैं तो कभी ज़िंदगी से थके हुए यात्री को हौंसला देते हैं। यह किताब अंतरचेतना को
संगति प्रदान करती प्रतीत होती है।
अमृता जी कहती हैं “ मिर्ज़ा एक मन है जो साहिबा
के तन में बसता है और जो यह अनुभव कर सका वही मुहब्बत के आलम को समझ सकता है।
साहिबा व मिर्ज़ा के बदन उस पाक मस्ज़िद से हो गए हैं जहां पाँच नमाज़े बस्ता लेकर
मोहब्बत की तालीम पाने आती हैं।“
वजूद की गहराई तक उतरती इस किताब में अमृता जी ने
अपनी कुछ एक नज़्में भी पिरोयी हैं-
1.
अनुभव एक है असीम का - अनंत का,
पर एक रास्ता तर्क का है
जहां वह कदम कदम साथ चलता है,
और एक रास्ता वह है जहां तर्क एक ओर खड़ा देखता रह
जाता है॥
2.
जाने कितनी खामोशियाँ हैं
जो हमसे आवाज मांगती हैं
और जाने कितने गुमनाम चेहरे हैं
जो हमसे पहचान मांगते हैं॥
3.
अमृता जी ने हाफिज़ शीराजी के कुछ ख्यालों को भी
इस किताब में जगह दी है,
हाफिज़ जी कहते हैं
”साकी! जाम को गदरिया में ला और मुझे दे,
इब्तदा-ए-इश्क़ तो आसान नज़र आया
लेकिन इंतहा बहुत मुश्किल हुई”
दुनिया की शेर-ओ-शायरी में कुछ ऐसे आशार हैं जो
नज़र भर देखने के लिए नहीं होते, उनके पास एक घड़ी ठहर कर गुज़र जाना होता है। हाफिज़
का यह शेर एक लम्बी यात्रा को लिए हुए है, जिसमें एक छोर पर खड़े हो जाएं तो इश्क़
आसान नज़र आता है और दूसरे छोर तक पहुचते पहुचते सब कुछ एक मुश्किल में ढ़ल जाता है।
इसी तरह के रूहानी हर्फों से दिल तक का फासला तय
करती है अमृता जी की यह किताब “मन मिर्ज़ा तन साहिबा”।
Book Review: Saat Sawaal - Amrita Pritam
यूँ तो अमृता प्रीतम जी की हर किताब कुदरत की रूह-सी होती है उसको पढ़ना एक नई
दुनिया की सैर करने जैसा है, जहाँ
अहसास चेहरा लगाये घूमते हैं।
अमृता जी ने अपनी इस किताब “सात सवाल” में
अलग-अलग क्षेत्रों के कलाकार, विद्वान
चुने हैं और उन्हे अपनी कला अपनी यात्रा के बारे में बताने का पूरा अधिकार भी दिया
है। इस किताब में रखे गये विचार आपके चिंतन के दायरे को विस्तार देते हैं।
खुशवंत सिंह, अनीस जंग, राज गिल, इमरोज़ चित्रकार, कृष्ण अशांत, अमर भारती, घूसवां साइमी जैसे कलाकारों
से अमृता जी द्वारा सात सवाल किये गए, जिसमें साँतवा सवाल आजाद था जो उस शख्सियत के स्वयं के ज़हन से था।
जब आप साक्षात्कार संबधी किताबें पढ़ते हैं तो आप उनकी ज़िन्दगी की उस
तह से रू-ब-रू होते हैं जहां उनकी कला ने जन्म लिया होगा, उनके अस्तित्व का उद्गम
स्थल।
इसी किताब में इमरोज़ कहते हैं
“ज़िन्दगी पानी है और कला उसकी रवानी उसका प्रवाह। कुछ चित्र वक्त के
दस्तावेज़ नहीं बनते।"
वहीं मसऊद मुनव्वर फरमाते हैं –
रोशनी भर याद की खुशबू जला रखता हूँ मैं,
फ़ासलों के ख्वाब फरदों पर उठा रखता हूँ मैं।
इसके अतिरिक्त एक मीठा सा सच भी पढ़ा मैंने इस किताब में..
” तहज़ीब का
धर्म से कोइ वास्ता नहीं, सिर्फ
इंसानियत से होता है।“
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