March 23, 2015
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March 22, 2015
Book Review : लप्रेक: इश्क़ में शहर होना – रवीश कुमार
लेखक – रवीश कुमार
चित्रांकन – विक्रम
नायक
पब्लिशर – राजकमल
प्रकाशन (सार्थक)
रवीश जी को किसी परिचय की आवश्यकता तो नहीं है फिर भी हम उन्हें “रवीश
कुमार NDTV” के नाम से जानते हैं। रवीश जी
की किताब ‘लप्रेक: इश्क़ में शहर होना’ हाथों
में आई तो कुछ पन्ने पलटते ही यकीन हो चला कि अच्छे दिन आ गए, जोक्स
अपार्ट पर किताब है ही इतनी खूबसूरत।
प्रेम अहसासों को लघु कथाओं में पिरोकर एक पेंटिग सी बना दी गई
है जिसमें विक्रम नायक जी का एनिग्मेटिक चित्रांकन किताब को पूर्ण करता है, जैसे
माँ शब्द में लगने वाला चन्द्र-बिन्दु जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र संगम पर कल-कल बहता
जल।
रवीश जी ने दिल्ली शहर को गाँव की नज़र से पेश किया है, वह
लिखते है –
“गाँवों
में घर नहीं खोता लेकिन शहर में खो सकता है।“
”दिल्ली
का अजनबीपन रोमांस का सबसे अच्छा दोस्त है।“
कुछ लघु कथाओं में गाँव के पीछे छूट जाने का दर्द तो कहीं शहरों की
हर गली में पनपता इश्क़ और उसके दस्तूर। रवीश जी लिखते हैं –
“इश्क़
में सिर्फ देखना ही नही होता, अनदेखा भी करना होता है।“
”जान-पहचान
की जगह से अनजान जगहों पर जाना ही इश्क़ में शहर होना है।“
“औकात
की हर लड़ाई का आधार अंग्रेज़ी थोड़ी ना है”
“हाकिम
से दुहाई है कि शहर में मोहब्बत मुल्तवी कर दें।“
प्रेम में होना सिर्फ हाथ थामने का बहाना ढ़ूढ़ना नहीं होता। दो लोगों
के उस स्पेस में बहुत कुछ टकराता रहता है।‘लप्रेक’ उसी
कशिश और टकराहट की पैदाइश है। जब आप
किताब के अंतिम पृष्ठ पर पहुंचते है तो लगता है जैसे अभी कुछ बाकी रह गया हो और
उंगलियाँ पीछे की ओर पन्ने पलटने लगती हैं, आंखें
खामोशी से चन्द लफ्ज़ों में सिमटा इश्क-शहर दोहराती हैं।
P.s - Book Source - Praveen Pandey. A Big Thank You!
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February 15, 2015
गुलजार साब की नज़्म - सब कुछ वैसे ही चलता है
“जो गुजर जाती है बस उसपे गुज़र करते हैं" ज़िंदगी की दास्तां बयाँ करते गुलजार साब के लफ्ज़ हमारे एहसासों को आवाज़ दे जाते हैं। अक्सर उनकी नज़्मों और गीतों में उलझ कर मायने मिल जाते हैं सांसों को, अर्थ मिल जाता है जीवन का..
कैसे कोई इतने आसान लफ्ज़ों में अनकही
यादें पिरो देता है, क्यूँ हम अपनी ज़िदंंगी में घटा हुआ, उनके गीतों में ढ्ंढू लेते हैं, शायद यही गुलजार हैं..
गुलजार साब की नज़्म "सब कुछ वैसे ही
चलता है" धीमे से कामों में एक कड़वा सच गुनगुना जाती है कि ज़िंदगी एक रवायत
है, जिसे निभाना पड़ता है, उनके बिना भी जो कभी आपकी ज़िंदगी थे।
सब कुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था जब तुम थी
रात भी वैसे ही
सर मूंदे आती है
दिन भी वैसे ही
आँखें मलता जागता है
तारे सारी रात जम्हाईयाँ लेते हैं
सब कुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था
जब तुम थी
काश तुम्हारे जाने पर
कुछ फर्क तो पड़ता जीने में
प्यास ना लगती पानी की
या नाखून बढना बंद हो जाते
बाल हवा में ना उड़ते
या धुंआ निकलता सांसों से
सब कुछ वैसे ही चलता है
बस इतना फर्क पड़ा है मेरी रातों में
नींद नहीं आती तो
अब सोने के लिए
एक नींद की गोली
रोज़ निगलनी पड़ती है
- गुलजार साब
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