March 22, 2015

Book Review : लप्रेक: इश्क़ में शहर होना – रवीश कुमार


टाइटल - इश्क़ में शहर होना

लेखक – रवीश कुमार
चित्रांकन – विक्रम नायक
पब्लिशर – राजकमल प्रकाशन (सार्थक)

रवीश जी को किसी परिचय की आवश्यकता तो नहीं है फिर भी हम उन्हें रवीश कुमार NDTV” के नाम से जानते हैं। रवीश जी की किताब लप्रेक: इश्क़ में शहर होना हाथों में आई तो कुछ पन्ने पलटते ही यकीन हो चला कि अच्छे दिन आ गए, जोक्स अपार्ट पर किताब है ही इतनी खूबसूरत।

प्रेम अहसासों को लघु कथाओं में पिरोकर एक  पेंटिग सी बना दी गई है जिसमें विक्रम नायक जी का एनिग्मेटिक चित्रांकन किताब को पूर्ण करता है, जैसे माँ शब्द में लगने वाला चन्द्र-बिन्दु जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र संगम पर कल-कल बहता जल।

रवीश जी ने दिल्ली शहर को गाँव की नज़र से पेश किया है, वह लिखते है 
  “गाँवों में घर नहीं खोता लेकिन शहर में खो सकता है।
  ”दिल्ली का अजनबीपन रोमांस का सबसे अच्छा दोस्त है।

कुछ लघु कथाओं में गाँव के पीछे छूट जाने का दर्द तो कहीं शहरों की हर गली में पनपता इश्क़ और उसके दस्तूर। रवीश जी लिखते हैं 
  “इश्क़ में सिर्फ देखना ही नही होता, अनदेखा भी करना होता है।
  ”जान-पहचान की जगह से अनजान जगहों पर जाना ही इश्क़ में शहर होना है।
  “औकात की हर लड़ाई का आधार अंग्रेज़ी थोड़ी ना है
  “हाकिम से दुहाई है कि शहर में मोहब्बत मुल्तवी कर दें।

प्रेम में होना सिर्फ हाथ थामने का बहाना ढ़ूढ़ना नहीं होता। दो लोगों के उस स्पेस में बहुत कुछ टकराता रहता है।लप्रेक उसी कशिश और टकराहट की पैदाइश है। जब आप किताब के अंतिम पृष्ठ पर पहुंचते है तो लगता है जैसे अभी कुछ बाकी रह गया हो और उंगलियाँ पीछे की ओर पन्ने पलटने लगती हैं, आंखें खामोशी से चन्द लफ्ज़ों में सिमटा इश्क-शहर दोहराती हैं। 


P.s - Book Source - Praveen Pandey. A Big Thank You! 

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In The Rain : A Short Story





Dear Shelly : A Short Story





February 15, 2015

गुलजार साब की नज़्म - सब कुछ वैसे ही चलता है


जो गुजर जाती है बस उसपे गुज़र करते हैं" ज़िंदगी की दास्तां बयाँ करते गुलजार साब के लफ्ज़ हमारे एहसासों को आवाज़ दे जाते हैं। अक्सर उनकी नज़्मों और गीतों में उलझ कर मायने मिल जाते हैं सांसों को, अर्थ मिल जाता है जीवन का.. 

कैसे कोई इतने आसान लफ्ज़ों में अनकही यादें पिरो देता हैक्यूँ हम अपनी ज़िदंंगी में घटा हुआ, उनके गीतों में ढ्ंढू लेते हैंशायद यही गुलजार हैं..

गुलजार साब की नज़्म "सब कुछ वैसे ही चलता है" धीमे से कामों में एक कड़वा सच गुनगुना जाती है कि ज़िंदगी एक रवायत है, जिसे निभाना पड़ता है, उनके बिना भी जो कभी आपकी ज़िंदगी थे। 

सब कुछ वैसे ही चलता है 
जैसे चलता था जब तुम थी 

रात भी वैसे ही 
सर मूंदे आती है 
दिन भी वैसे ही 
आँखें मलता जागता है 

तारे सारी रात जम्हाईयाँ लेते हैं 
सब कुछ वैसे ही चलता है 
जैसे चलता था 
जब तुम थी 

काश तुम्हारे जाने पर
कुछ फर्क तो पड़ता जीने में 
प्यास ना लगती पानी की 
या नाखून बढना बंद हो जाते 
बाल हवा में ना उड़ते 
या धुंआ निकलता सांसों से 
सब कुछ वैसे ही चलता है 

बस इतना फर्क पड़ा है मेरी रातों में 
नींद नहीं आती तो 
अब सोने के लिए 
एक नींद की गोली 
रोज़ निगलनी पड़ती है 

- गुलजार साब


Post dedicated to Maa

January 30, 2015

Two Drifting Souls

Photo Credit : Google 


I observe you in moments.
Messy hair on your forehead, veils creases.
Half smile with perplexing eyes
As just-born-kid dreamt at mid night

In the shadow of beaming night lamp
I can write you within pages and more pages.
I can make you stay in four by four white chambers and put a stamp.
But..
Is it okay to trap your identity and embellish reins?
Is it okay to alphabetize you among thin lines?

While I know how does one feels with transected wings.
Would anybody desire to circle up just in one theme?
Would anybody desire to remain wrapped just in one routine?

Let’s take a fair chance
And surprise each other as dripping trance.
I started enjoying silence since I got you whole?
No limitations. No criteria.
Just two drifting souls!  

Ankita Chauhan 



Her Oasis : A Short Story


OFS Frame 17 : If someone would have lost his memories or emotional presence at some point in life, her soul mate is just creating like situations, they have lived before. And trying to get her back.






January 26, 2015

Alvida 2014

Photo Credit : Arushi Calender 

Although It could have written at the end of the year. But how could you write something without missing someone, so yes I am missing you Dear 2014, you have added some beautiful, sweet-and-salty moments to my life.

Guzar chala ye saal  bhi,
yun laga mano 
hawa ke jhonke mein lipta ek lamha
aahista se,
mujhe chookar nikla ho abhi abhi..

Kuch khatte meethe shikwe,
Kahin Sukoo’n bhari yaadein,
Kuch ek jhoote vaado’n  mein simta vo ek lamha..

anubhav  ki gathri (sack) bhari kar gaya ho..
umra mein kuch jod, Kuch ghata kar
zindagi ke ankganit uljha kar
ek masoom si rivayat nibha
Guzar chala ye saal bhi..


- Ankita Chauhan